इस गाइड में
निमाड़ के गाँवों में आज भी टंट्या भील की कहानियाँ सुनाई जाती हैं, जिन्हें लोग प्यार से टंट्या मामा कहते हैं: एक ऐसा व्यक्ति, जो धनी साहूकारों और व्यापारियों को लूटता, लूट का माल गरीबों में बाँट देता, और वर्षों तक ब्रिटिश पुलिस को चकमा देता रहा। अंग्रेज़ उन्हें डाकू कहते थे। बहुत से ग्रामीण उन्हें अपना रक्षक मानते थे। अधिकांश विवरणों के अनुसार विश्वासघात के कारण वे पकड़े गए, और 1889 में जबलपुर में उन्हें फाँसी दे दी गई।
टंट्या उन कई जनजातीय नेताओं में से एक हैं, जिनका औपनिवेशिक शासन, साहूकारों और वन कानूनों के विरुद्ध प्रतिरोध मध्य प्रदेश के इतिहास का हिस्सा है। देश के सभी राज्यों में सबसे बड़ी अनुसूचित जनजाति जनसंख्या मध्य प्रदेश में है, इसलिए यहाँ जनजातीय इतिहास कोई गौण विषय नहीं है। MPPSC इसे प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में (नेता, स्थान, तिथियाँ) और मुख्य परीक्षा (Mains) में पूछता है, जहाँ यह वन अधिकारों और PESA (पेसा) से जुड़े आज के प्रश्नों से जुड़ता है।
जनजातीय समुदायों ने प्रतिरोध क्यों किया
मध्य भारत के जनजातीय विद्रोह "अराजकता" के बेतरतीब विस्फोट नहीं थे, जैसा कि औपनिवेशिक अभिलेख अक्सर उन्हें बताते थे। उनके स्पष्ट कारण थे।
| कारण | ज़मीन पर इसका अर्थ |
|---|---|
| वन कानून | 1865 और 1878 (और बाद में 1927) के भारतीय वन अधिनियमों ने वनों को राज्य के लिए आरक्षित कर दिया; चराई, ईंधन इकट्ठा करना, शिकार और झूम खेती (बैगा इसे बेवर कहते हैं) अपराध बन गए |
| भूमि का हस्तांतरण (land alienation) | कर्ज़ और नए राजस्व नियमों के ज़रिए जनजातीय भूमि साहूकारों, व्यापारियों और ज़मींदारों के हाथ में चली गई |
| साहूकार | ऊँचे ब्याज वाले कर्ज़, जो जीवन भर की ऋण-दासता में बदल जाते थे |
| बेगार | अधिकारियों, वन रक्षकों और ज़मींदारों के लिए ज़बरन, बिना मज़दूरी का श्रम |
| स्वायत्तता का ह्रास | औपनिवेशिक अदालतों, पुलिस और राजस्व अधिकारियों ने पारंपरिक मुखियाओं और ग्राम पंचायतों की जगह ले ली |
नेता और आंदोलन
भीमा नायक और खाज्या नायक (निमाड़, 1857 के आसपास)
- भीमा नायक निमाड़ के बड़वानी क्षेत्र के भील नेता थे। 1857 के दौरान और उसके बाद उन्होंने सतपुड़ा की पहाड़ियों का उपयोग ब्रिटिश चौकियों के विरुद्ध छापामार युद्ध (guerrilla warfare) के लिए किया। कुछ विवरण उन्हें इस क्षेत्र से गुज़रे तात्या टोपे के अभियान से भी जोड़ते हैं।
- अंततः वे पकड़े गए और अधिकांश विवरणों के अनुसार उन्हें अंडमान द्वीप भेज दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हुई।
- उसी क्षेत्र के एक अन्य भील नेता खाज्या नायक के बारे में कहा जाता है कि वे पहले अंग्रेज़ों की सेवा में थे, फिर उनके विरुद्ध हो गए। उसी दौर में वे भीमा नायक के साथ मिलकर लड़े।
टंट्या भील (लगभग 1842–1889)
- वर्तमान खंडवा जिले में, निमाड़ क्षेत्र में जन्म।
- एक दशक से अधिक समय तक उन्होंने निमाड़ और मालवा में ब्रिटिश खज़ानों, साहूकारों और धनी व्यापारियों पर धावे बोले और लोकनायक बन गए — "भारतीय रॉबिन हुड"।
- पकड़े गए और 1889 में जबलपुर में फाँसी दी गई (अधिकांश विवरणों में 4 दिसंबर)।
- आज मध्य प्रदेश उन्हें स्मारकों और उनके नाम पर रखे गए सार्वजनिक स्थलों के माध्यम से याद करता है, खासकर इंदौर और निमाड़ के आसपास।
1857 में गोंड शासक
- गढ़ा-मंडला के गोंड शासकों के वंशज राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुँवर रघुनाथ शाह पर जबलपुर में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की योजना बनाने का आरोप लगा। सितंबर 1857 में उन्हें जबलपुर में तोप के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया। दोनों कवि थे, और उनके विरुद्ध मामला एक ऐसी कविता पर टिका था, जिसमें अंग्रेज़ों के विनाश का आह्वान था।
- मंडला और सिवनी के गोंड सरदार भी विद्रोह में शामिल हुए। व्यापक तस्वीर के लिए मध्य प्रदेश में 1857 देखें।
जंगल सत्याग्रह (1930)
मध्य प्रांत (Central Provinces) में समुद्र नहीं था, इसलिए सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) के दौरान यहाँ नमक बनाने का विकल्प नहीं था। इसके बजाय जनजातीय और किसान समुदायों ने वन कानून तोड़े: उन्होंने खुली अवज्ञा में आरक्षित वनों में घास और लकड़ी काटी और वहाँ मवेशी चराए। यही जंगल सत्याग्रह था।
| स्थान | क्या हुआ |
|---|---|
| बैतूल | कोरकू नेता गंजन सिंह कोरकू के नेतृत्व में; वन नियमों की बड़े पैमाने पर अवज्ञा |
| टुरिया (सिवनी) | अक्टूबर 1930 में पुलिस ने सत्याग्रहियों पर गोली चलाई, जिसमें महिलाओं सहित कई लोग मारे गए |
| छिंदवाड़ा, मंडला और अन्य | घास काटने और चराई के ऐसे ही विरोध-प्रदर्शन |
समयरेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1857 | विद्रोह; मंडला और सिवनी के गोंड सरदार शामिल; निमाड़ में भील प्रतिरोध |
| सितंबर 1857 | जबलपुर में राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को मृत्युदंड |
| 1857–1860 का दशक | भीमा नायक और खाज्या नायक सतपुड़ा की पहाड़ियों में लड़े |
| 1865 | पहला भारतीय वन अधिनियम |
| 1878 | भारतीय वन अधिनियम ने वनों पर राज्य का नियंत्रण और कड़ा किया |
| 1880 का दशक | निमाड़ में टंट्या भील की गतिविधियाँ चरम पर |
| 1889 | जबलपुर में टंट्या भील को फाँसी |
| 1927 | भारतीय वन अधिनियम, 1927 |
| 1930 | जंगल सत्याग्रह: बैतूल, सिवनी (टुरिया), छिंदवाड़ा |
| 2021 | केंद्र ने 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया |
| 2022 | मध्य प्रदेश ने अपने PESA नियम अधिसूचित किए |
विरासत
- 15 नवंबर (बिरसा मुंडा की जयंती) को जनजातीय गौरव दिवस, जो 2021 से पूरे देश में मनाया जाता है।
- मध्य प्रदेश ने नवंबर 2022 में अपने PESA नियम अधिसूचित किए, जिनसे अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाओं को भूमि, लघु वनोपज और स्थानीय संसाधनों पर अधिक अधिकार मिले। मध्य प्रदेश में पंचायती राज देखें।
- भोपाल का जनजातीय संग्रहालय, और टंट्या भील, भीमा नायक, शंकर शाह और रघुनाथ शाह के स्मारक।
- 2021 में भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम भोपाल क्षेत्र की गोंड रानी के नाम पर रानी कमलापति रखा गया।
स्वयं जनजातियों (भील, गोंड, बैगा, कोरकू, सहरिया और अन्य) के बारे में जानने के लिए मध्य प्रदेश की जनजातियाँ पर हमारी मार्गदर्शिका पढ़ें।
मुख्य परीक्षा के उत्तर की रूपरेखा
अभ्यास प्रश्न (लगभग 150 शब्द): औपनिवेशिक मध्य प्रदेश में जनजातीय प्रतिरोध के कारणों और स्वरूप की चर्चा कीजिए।
रूपरेखा:
- भूमिका: जनजातीय प्रतिरोध व्यापक था और उसके स्पष्ट आर्थिक कारण थे।
- कारण: वन कानून, भूमि का हस्तांतरण, साहूकार, बेगार, स्वायत्तता का ह्रास।
- स्वरूप: स्थानीय और नेता-केंद्रित (भीमा नायक, टंट्या भील); छापामार तरीके; बाद में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव (जंगल सत्याग्रह 1930)।
- उदाहरण: निमाड़, जबलपुर 1857, बैतूल और टुरिया पर एक-एक पंक्ति।
- निष्कर्ष: आज वन अधिकारों और PESA में इसकी विरासत।
आदर्श उत्तर (संक्षिप्त): औपनिवेशिक शासन 1865 और 1878 के वन अधिनियमों के ज़रिए मध्य भारत के वनों तक पहुँचा, जिन्होंने चराई, ईंधन इकट्ठा करने और झूम खेती को अपराध बना दिया। साथ ही, साहूकारों और बाहरी ज़मींदारों ने कर्ज़ के ज़रिए जनजातीय भूमि हथिया ली, और अधिकारी बेगार लेते थे। इसके जवाब में प्रतिरोध हुआ। 1857 में मंडला और सिवनी के गोंड सरदार उठ खड़े हुए, और राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को जबलपुर में मृत्युदंड दिया गया। निमाड़ में भील नेताओं भीमा नायक और खाज्या नायक ने छापामार युद्ध लड़ा, और बाद में टंट्या भील 1889 में फाँसी दिए जाने तक अंग्रेज़ों को चुनौती देते रहे। ये आंदोलन स्थानीय और नेता-केंद्रित थे। 1930 में बैतूल और सिवनी के जंगल सत्याग्रह ने जनजातीय शिकायतों को सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ दिया। वनों और भूमि पर नियंत्रण की उनकी माँगें आज वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) और मध्य प्रदेश के PESA नियमों में गूँजती हैं।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास
- किसे लोकप्रिय रूप से "भारतीय रॉबिन हुड" कहा जाता है? (a) भीमा नायक (b) टंट्या भील (c) तात्या टोपे (d) गंजन सिंह कोरकू
- टंट्या भील को कहाँ फाँसी दी गई? (a) इंदौर (b) खंडवा (c) जबलपुर (d) शिवपुरी
- बैतूल में जंगल सत्याग्रह (1930) का नेतृत्व किसने किया? (a) गंजन सिंह कोरकू (b) भीमा नायक (c) रघुनाथ शाह (d) खाज्या नायक
- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (1) राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह को 1857 में जबलपुर में मृत्युदंड दिया गया। (2) जनजातीय गौरव दिवस बिरसा मुंडा की जयंती पर मनाया जाता है। कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) दोनों (d) कोई नहीं
- भीमा नायक किनके नेता थे? (a) मंडला के गोंड (b) बैतूल के कोरकू (c) निमाड़ के भील (d) डिंडोरी के बैगा
उत्तर: 1 (b)। 2 (c): शिवपुरी में तात्या टोपे को फाँसी दी गई थी। 3 (a)। 4 (c)। 5 (c)।
आगे क्या करें
- समयरेखा याद करें, और टंट्या भील तथा तात्या टोपे को अलग-अलग रखें।
- पहली तालिका के पाँच कारण सीखें; ये जनजातीय असंतोष से जुड़े किसी भी प्रश्न में काम आते हैं।
- GS II के उत्तरों के लिए इस विषय को वन अधिकार अधिनियम और PESA से जोड़ें।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Madhya Pradesh Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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