इस गाइड में
राजस्थान के मरुस्थल की एक कहावत का आशय कुछ यूँ है कि फ़सल भले धोखा दे जाए, पशुधन कभी साथ नहीं छोड़ता। जिस धरती पर वर्षा अनिश्चित हो और खेती जोखिम भरी, वहाँ पशु — गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और ऊँट — लंबे समय से आय और भोजन का सबसे भरोसेमंद स्रोत रहे हैं। राजस्थान की पशुधन अर्थव्यवस्था भारत की सबसे बड़ी पशुधन अर्थव्यवस्थाओं में है। सदियों में गर्मी, सूखे और कम चारे के अनुरूप ढली यहाँ की नस्लें देश के सबसे मूल्यवान आनुवंशिक संसाधनों में गिनी जाती हैं।
पशुधन क्यों महत्त्वपूर्ण है
- सूखे का बीमा — फ़सल नष्ट हो जाए तब भी पशु जीवित रह सकते हैं, और बुरे वर्षों में इन्हें बेचा जा सकता है।
- आय — दूध, ऊन, मांस, खाल और भारवाहक शक्ति।
- समावेशन — पशुओं का बड़ा हिस्सा भूमिहीन और सीमांत परिवारों के पास है; देखभाल का अधिकांश काम महिलाएँ करती हैं।
- पोषण — दूध और दुग्ध उत्पाद भोजन का केंद्रीय हिस्सा हैं।
- संस्कृति — पशु मेले, पशुओं से जुड़े लोक देवता (पाबूजी, तेजाजी, देवनारायण), और रायका (रेबारी) जैसे पशुपालक समुदाय।
राजस्थान की स्थिति
हाल की पशुगणनाओं (Livestock Census) के अनुसार राजस्थान में:
- किसी भी राज्य की तुलना में सबसे बड़ी कुल पशु-आबादियों में से एक है;
- भारत में सबसे अधिक ऊँट हैं (देश के अधिकांश ऊँट);
- बकरियों और भेड़ों की आबादी सबसे बड़ी आबादियों में है;
- भारत के दूध और ऊन उत्पादन में इसका अग्रणी हिस्सा है।
गाय की नस्लें
| नस्ल | क्षेत्र | टिप्पणी |
|---|---|---|
| थारपारकर | जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर | दोहरे उपयोग वाली; सूखे में भी टिकाऊ; अच्छा दूध |
| राठी | बीकानेर, श्रीगंगानगर | मरुस्थल की अच्छी दुधारू नस्ल — कभी-कभी "मरुस्थल की कामधेनु" कहलाती है |
| कांकरेज | बाड़मेर, जालोर, सिरोही | मज़बूत भारवाहक पशु |
| गिर | अजमेर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़ (गुजरात से) | अच्छा दूध; स्थानीय रूप से अजमेरी कहलाती है |
| नागौरी | नागौर | प्रसिद्ध भारवाहक बैल — नागौर मेले में बहुत मूल्यवान माने जाते हैं |
| मालवी | झालावाड़, कोटा | भारवाहक; मालवा पठार से |
| मेवाती | अलवर, भरतपुर | भारवाहक और दुधारू |
| हरियाणवी | सीकर, झुंझुनूं, चूरू | दोहरे उपयोग वाली |
भैंसें
- मुर्रा (जयपुर, अलवर, भरतपुर, सीकर) — अधिक दूध देने वाली नस्ल।
- सुरती (दक्षिणी राजस्थान) और जाफ़राबादी।
- राजस्थान के दूध का बड़ा हिस्सा भैंसों से आता है।
भेड़
| नस्ल | क्षेत्र | टिप्पणी |
|---|---|---|
| चोकला | चूरू, झुंझुनूं, सीकर | भारत की सबसे बढ़िया कालीन ऊन — कभी-कभी "भारत की मेरिनो" कहलाती है |
| मगरा | बीकानेर, चूरू, नागौर | चमकदार कालीन ऊन |
| मारवाड़ी | जोधपुर, बाड़मेर, जालोर | संख्या में सबसे अधिक; टिकाऊ |
| जैसलमेरी | जैसलमेर | लंबी टाँगों वाली; कालीन ऊन |
| नाली | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ | कालीन ऊन |
| मालपुरा और सोनाडी | टोंक, जयपुर; उदयपुर, डूंगरपुर | मांस और मोटी ऊन |
केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान (Central Sheep and Wool Research Institute) अविकानगर (टोंक) में है।
बकरियाँ
- मारवाड़ी (सबसे आम), सिरोही (मांस और दूध की अच्छी नस्ल), जमुनापारी, बरबरी और झकराना (अलवर)।
- बकरी को "गरीब की गाय" कहा जाता है — भूमिहीन परिवारों के लिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है।
ऊँट: रेगिस्तान का जहाज़
- भारत में सबसे बड़ी ऊँट आबादी राजस्थान में है।
- प्रमुख नस्लें: बीकानेरी (मज़बूत, भारी), जैसलमेरी (तेज़ सवारी वाला ऊँट), मेवाड़ी, मारवाड़ी, जालोरी और कच्छी।
- 2014 में ऊँट को राजस्थान का राज्य पशु (पशुधन श्रेणी) घोषित किया गया। राजस्थान ऊँट (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम, 2015 (Rajasthan Camel (Prohibition of Slaughter and Regulation of Temporary Migration or Export) Act, 2015) ने ऊँट के वध पर रोक लगाई और राज्य से बाहर उनकी आवाजाही सीमित की।
- राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (National Research Centre on Camel) बीकानेर में है।
- BSF का ऊँट दस्ता पश्चिमी सीमा पर गश्त करता है और गणतंत्र दिवस परेड में भी दिखाई देता है।
ऊँटों की घटती संख्या
हाल के दशकों में ऊँटों की संख्या तेज़ी से घटी है। इसके कारण हैं:
- मशीनीकरण (ट्रैक्टर और ट्रक ऊँटों की जगह ले रहे हैं);
- नहरों, खेतों और ऊर्जा परियोजनाओं के कारण चरागाहों (ओरण और साझा भूमि) का नष्ट होना;
- 2015 का कानून, जिसने ऊँटों को संरक्षण तो दिया, पर व्यापार पर रोक लगाकर उनका विक्रय मूल्य घटा दिया;
- युवा पशुपालकों की घटती रुचि।
इस गिरावट को रोकने के प्रयासों में ऊँटनी के दूध से बने उत्पादों को बढ़ावा, डेयरियाँ (जैसे बीकानेर में), पर्यटन और ऊँट पालकों के लिए प्रोत्साहन योजनाएँ शामिल हैं।
डेयरी
- राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन (RCDF) आणंद (अमूल) मॉडल पर चलता है और दूध तथा दुग्ध उत्पादों को सरस ब्रांड के नाम से बेचता है।
- ज़िला दुग्ध संघ और ग्राम स्तर की सहकारी समितियाँ उत्पादकों से दूध एकत्र करती हैं।
- राजस्थान भारत के अग्रणी दुग्ध उत्पादक राज्यों में है।
चुनौतियाँ
| चुनौती | व्याख्या |
|---|---|
| चारा और पानी | सूखे के वर्षों में भारी कमी; पशु शिविरों की ज़रूरत |
| कम उत्पादकता | प्रति पशु दूध की पैदावार कम |
| पशु चिकित्सा | दूरदराज़ क्षेत्रों में सीमित सेवाएँ; रोगों का प्रकोप (जैसे 2022 में लम्पी स्किन रोग) |
| चरागाह | गोचर और ओरण भूमि पर अतिक्रमण |
| बेसहारा पशु | कस्बों और खेतों में छोड़े गए पशु |
| बाज़ार | ऊन, मांस और ऊँट उत्पादों के लिए संगठित बाज़ार सीमित |
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- भारत में सबसे अधिक ऊँट किस राज्य में हैं?
- किस भेड़ नस्ल को "भारत की मेरिनो" कहा जाता है?
- राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र कहाँ है?
- राजस्थान सहकारी डेयरी फेडरेशन का ब्रांड नाम क्या है?
- नागौर मेले में बिकने वाले भारवाहक बैलों के लिए कौन-सी गाय नस्ल प्रसिद्ध है?
मुख्य परीक्षा (Mains) शैली (50 शब्द): राजस्थान में पशुधन को सूखे का बीमा क्यों कहा जाता है?
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): राजस्थान में ऊँटों की घटती संख्या के कारणों की विवेचना कीजिए और उपाय सुझाइए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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