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किसान और जनजातीय आंदोलन: बिजौलिया से मानगढ़ तक

बिजौलिया में दर्जनों लागतों के बोझ तले दबे किसानों ने भारत के सबसे लंबे किसान आंदोलनों में से एक खड़ा किया। बाँसवाड़ा की पहाड़ियों में 1913 में मानगढ़ पर गोविंद गुरु के भील अनुयायियों पर गोलियाँ चलाई गईं। बेगूं और बूँदी से लेकर नीमूचणा और नीमड़ा तक, राजस्थान के किसान और जनजातीय आंदोलनों ने रियासतों में राजनीतिक जागृति की नींव रखी।

10 Oct 2026 4 मिनट में पढ़ें

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इस गाइड में
  1. किसान और जनजातियाँ क्यों उठ खड़े हुए
  2. बिजौलिया आंदोलन
  3. अन्य किसान आंदोलन
  4. जनजातीय आंदोलन
  5. महत्व
  6. अभ्यास

17 नवंबर 1913 को हज़ारों भील बाँसवाड़ा और गुजरात की सीमा पर स्थित मानगढ़ की पहाड़ी पर अपने नेता गोविंद गुरु के आसपास इकट्ठा हुए। वे एक धार्मिक सम्मेलन के लिए आए थे, पर रियासतों और अंग्रेज़ों को इसमें ख़तरा दिखा। सैनिकों ने पहाड़ी को घेरकर गोलियाँ चलाईं। कितने लोग मारे गए, यह अनिश्चित है — परंपरा और बाद के विवरण सैकड़ों या उससे भी अधिक की बात करते हैं — और मानगढ़ को अक्सर अमृतसर से छह वर्ष पहले का "राजस्थान का जलियाँवाला" कहा जाता है। यह उन कई घटनाओं में से एक है, जिनमें बीसवीं शताब्दी के आरंभ में राजस्थान के किसानों और जनजातियों ने शोषण का प्रतिरोध किया।

किसान और जनजातियाँ क्यों उठ खड़े हुए

कारणव्याख्या
जागीरदारी व्यवस्थाबहुत-सी भूमि जागीरदारों और ठिकानेदारों के पास थी, जो लगान वसूलते थे और स्थानीय सत्ता चलाते थे
लाग-बागभू-राजस्व के ऊपर दर्जनों अतिरिक्त लागतें (कर) — आंदोलन के विवरणों के अनुसार बिजौलिया में 84 तक
बेगारज़बरन, बिना मज़दूरी का श्रम
अकाल और कर्ज़बार-बार पड़ने वाले अकाल; साहूकारों का कर्ज़
वन-प्रतिबंधजनजातियों के वन-उपयोग पर रोक
दोहरी अधीनताकिसान शासक, जागीरदार और परोक्ष रूप से अंग्रेज़ों, तीनों की प्रजा थे

बिजौलिया आंदोलन

मेवाड़ का ठिकाना बिजौलिया (आज के भीलवाड़ा ज़िले में) भारत के सबसे लंबे किसान आंदोलनों में से एक का केंद्र रहा।

चरणनेता / घटनाएँ
1897 सेकिसानों (मुख्यतः धाकड़ समुदाय) ने लागतों का विरोध किया; आरंभिक नेताओं में साधु सीताराम दास शामिल थे
1916 सेक्रांतिकारी विजय सिंह पथिक (भूप सिंह) ने किसानों को संगठित किया; किसान पंच बोर्ड; कर न चुकाने का अभियान; प्रताप (कानपुर) जैसे राष्ट्रीय समाचार-पत्रों में प्रचार
1920 का दशकमाणिक्यलाल वर्मा और अन्य जुड़े; मेवाड़ रियासत और AGG से वार्ता; एक समझौते (1922) से कई लागतें समाप्त हुईं, पर उसका पूरी तरह पालन नहीं हुआ
1941मेवाड़ सरकार के अधीन अंतिम समझौता

बिजौलिया ने पूरे राजस्थान में आंदोलनों को प्रेरित किया और राष्ट्रीय ध्यान खींचा — गांधीजी और कांग्रेस ने इसमें रुचि ली।

अन्य किसान आंदोलन

आंदोलनस्थानमुख्य बातें
बेगूंचित्तौड़गढ़ (मेवाड़)1921 से, रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में; गोविंदपुरा गोलीकांड (1923) में किसान मारे गए; ठाकुर के साथ हुए समझौते को "बोल्शेविक" कहकर मेवाड़ ने ठुकरा दिया; ट्रेंच आयोग की जाँच
बूँदीबूँदी1920 का दशक; नैनूराम शर्मा के नेतृत्व में; डाबी में गोलीकांड (1923), जिसमें नानक भील मारे गए
शेखावाटीसीकर, झुंझुनूं1920 और 1930 के दशकों में ठिकानेदारों के विरुद्ध जाट किसान; कूदन गोलीकांड (1935) जैसी घटनाएँ
अलवर — नीमूचणाअलवर14 मई 1925 — भू-राजस्व वृद्धि का विरोध कर रहे किसानों पर गोलीबारी; बहुत-से लोग मारे गए; गांधीजी ने इसे जलियाँवाला से भी बुरा कहा

जनजातीय आंदोलन

गोविंद गुरु और भगत आंदोलन

गोविंद गुरु (डूँगरपुर क्षेत्र में जन्मे) ने सम्प सभा (1883) की स्थापना की और डूँगरपुर, बाँसवाड़ा तथा आसपास के क्षेत्रों के भीलों में भगत आंदोलन चलाया। उन्होंने सिखाया:

  • शराब और मांस छोड़ना;
  • स्वच्छता और उपासना;
  • जागीरदारों और रियासतों की बेगार और शोषण का प्रतिरोध।

इस आंदोलन से शासक और अंग्रेज़ चिंतित हो गए, और इसी का परिणाम 1913 का मानगढ़ गोलीकांड था। गोविंद गुरु को जेल में डाला गया और बाद में क्षेत्र से निर्वासित कर दिया गया।

मोतीलाल तेजावत और एकी आंदोलन

मोतीलाल तेजावत ने 1921–22 में मेवाड़, सिरोही और आसपास के क्षेत्रों के भीलों और गरासियों में अत्यधिक करों और बेगार के विरुद्ध एकी ("एकता") आंदोलन चलाया। 1922 में नीमड़ा (विजयनगर, ईडर क्षेत्र) में सैनिकों ने एक बड़ी सभा पर गोली चलाई, जिसमें बहुत-से लोग मारे गए। तेजावत बाद में गिरफ़्तार हुए; 1936 में उन्हें रिहा किया गया।

मीणा आंदोलन

मीणाओं ने आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) और जयपुर रियासत के जरायम पेशा (अपराधी जनजाति) क़ानूनों का विरोध किया, जिनके तहत पुरुषों को पंजीकरण कराना और रोज़ थाने में हाज़िरी देनी पड़ती थी। जैन मुनि मगन सागर, बंशीधर शर्मा और लक्ष्मीनारायण झरवाल जैसे नेताओं के समर्थन वाले इस आंदोलन के कारण स्वतंत्रता के बाद ये प्रतिबंध हटाए गए।

महत्व

  1. जागरूकता — किसानों और जनजातियों ने रियासती, सामंती और औपनिवेशिक सत्ता की मिली-जुली व्यवस्था को चुनौती दी।
  2. संगठन — पंचायतें, सभाएँ और कर न चुकाने के अभियान बाद के आंदोलनों के लिए आदर्श बने।
  3. राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव — पथिक और वर्मा जैसे नेताओं ने आगे चलकर प्रजामंडलों की नींव रखी।
  4. स्मृति — मानगढ़, नीमूचणा और नीमड़ा बलिदान के स्थलों के रूप में याद किए जाते हैं; हाल के वर्षों में मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विकसित करने के प्रयास हुए हैं।

अभ्यास

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:

  1. 1916 से बिजौलिया आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
  2. मानगढ़ गोलीकांड कहाँ और कब हुआ?
  3. मोतीलाल तेजावत ने किस आंदोलन का नेतृत्व किया?
  4. नीमूचणा गोलीकांड कहाँ हुआ?
  5. बेगूं आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?

मुख्य परीक्षा (Mains) शैली (50 शब्द): लाग-बाग क्या था?

मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): राजस्थान में किसान आंदोलनों के कारणों और महत्व का परीक्षण कीजिए।

तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।

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