इस गाइड में
ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य साफ़ था: औपनिवेशिक शासन। राजपूताना की देशी रियासतों में स्थिति कहीं अधिक उलझी हुई थी। यहाँ लोगों पर उनके अपने राजा राज करते थे, और वे राजा स्वयं अंग्रेज़ों से बँधे थे। नागरिक स्वतंत्रताओं, उत्तरदायी शासन (responsible government) और सामंती शोषण के अंत की माँगें शासकों से करनी पड़ती थीं — जो प्रायः प्रतिबंध, गिरफ़्तारी और निर्वासन से जवाब देते थे। इसी दोहरे संघर्ष से प्रजामंडल ("जनता के संगठन") उभरे, जो राजस्थान में राजनीतिक जागृति का मुख्य माध्यम बने।
क्रांतिकारी
प्रजामंडलों से पहले, राजस्थान के क्रांतिकारियों के एक समूह ने इस क्षेत्र को व्यापक सशस्त्र संघर्ष से जोड़ा।
| व्यक्तित्व | योगदान |
|---|---|
| अर्जुनलाल सेठी (जयपुर) | जयपुर में वर्धमान विद्यालय (1907) की स्थापना की, जहाँ युवा क्रांतिकारी तैयार हुए |
| केसरी सिंह बारहठ (शाहपुरा) | कवि और क्रांतिकारी; चेतावणी रा चूँगट्या (1903) के रचयिता; क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जेल गए |
| प्रताप सिंह बारहठ | केसरी सिंह के पुत्र; वायसराय हार्डिंग पर हमले के प्रयास (1912) में शामिल; साथियों के साथ विश्वासघात से इनकार करने के बाद बरेली जेल में मृत्यु (1918) |
| राव गोपाल सिंह खरवा (खरवा, अजमेर) | 1915 में सशस्त्र विद्रोह की रासबिहारी बोस की योजनाओं से जुड़े क्रांतिकारी |
| विजय सिंह पथिक | क्रांतिकारी, जिन्होंने आगे चलकर बिजौलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किया |
आरंभिक संगठन
- राजपूताना मध्य भारत सभा (1918 में स्थापित, कांग्रेस से जुड़ी) — राजपूताना और मध्य भारत की रियासतों की जनता के लिए काम किया।
- राजस्थान सेवा संघ (1919, विजय सिंह पथिक और अन्य द्वारा वर्धा में स्थापित; बाद में अजमेर स्थानांतरित) — बिजौलिया और बेगूं जैसे किसान आंदोलनों का समर्थन किया।
- अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (All India States Peoples' Conference) (1927) — सभी रियासतों की जनता का राष्ट्रीय मंच।
हरिपुरा का मोड़ (1938)
शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रियासतों के भीतर के आंदोलनों से दूरी रखती थी। 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित किया कि रियासतों की जनता उत्तरदायी शासन के लिए संघर्ष करने हेतु अपने संगठन बनाए। इससे पूरे राजस्थान में प्रजामंडलों के गठन को बल मिला।
प्रमुख प्रजामंडल
| रियासत | संगठन | वर्ष (स्थापना / पुनर्गठन) | प्रमुख नेता |
|---|---|---|---|
| जयपुर | जयपुर प्रजामंडल | 1931; पुनर्गठन 1936 | कपूरचंद पाटनी; जमनालाल बजाज (अध्यक्ष, 1938); हीरालाल शास्त्री |
| मारवाड़ (जोधपुर) | मारवाड़ हितकारिणी सभा; मारवाड़ लोक परिषद (1938) | 1920 का दशक–1938 | जयनारायण व्यास |
| मेवाड़ (उदयपुर) | मेवाड़ प्रजामंडल | 1938 | माणिक्यलाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता |
| बीकानेर | बीकानेर प्रजामंडल | 1936 (कोलकाता में स्थापित) | मघाराम वैद्य |
| कोटा | हाड़ौती प्रजामंडल (1934); कोटा राज्य प्रजामंडल (1939) | 1934, 1939 | नैनूराम शर्मा, अभिन्न हरि |
| भरतपुर | भरतपुर प्रजामंडल | 1938 | किशनलाल जोशी, गोपीलाल यादव |
| अलवर | अलवर प्रजामंडल | 1938 | हरिनारायण शर्मा |
| डूँगरपुर | डूँगरपुर प्रजामंडल | 1944 | भोगीलाल पंड्या |
| बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही, शाहपुरा, करौली, धौलपुर, जैसलमेर, किशनगढ़ | 1930 के दशक के अंत और 1940 के दशक में बने प्रजामंडल | — | स्थानीय नेता |
प्रजामंडलों की माँगें
- नागरिक स्वतंत्रताएँ — बोलने, प्रेस और संगठन बनाने की स्वतंत्रता।
- उत्तरदायी शासन — निर्वाचित सभाएँ और जनता के प्रति जवाबदेह मंत्री।
- बेगार, अत्यधिक लागतों और सामंती शोषण का अंत।
- सामाजिक सुधार — शिक्षा, दलितों और महिलाओं के अधिकार।
शासक प्रायः प्रतिबंध, गिरफ़्तारी और नेताओं के निर्वासन से जवाब देते थे। फिर भी 1940 के दशक तक कई रियासतों ने निर्वाचित सभाएँ या लोकप्रिय मंत्रिमंडल देना शुरू कर दिया था।
रियासतों में भारत छोड़ो (1942)
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई रियासतों के प्रजामंडलों ने प्रदर्शन और हड़तालें कीं। मेवाड़ में प्रजामंडल ने माँग की कि महाराणा अंग्रेज़ों से नाता तोड़ें; जयपुर में प्रजामंडल का रुख़ अधिक सतर्क रहा, जिससे फूट पड़ी और आज़ाद मोर्चा बना। अनेक नगरों में छात्र और मज़दूर प्रदर्शनों में शामिल हुए।
सागरमल गोपा
राजनीतिक गतिविधियों को कठोरता से कुचलने वाली रियासत जैसलमेर में सागरमल गोपा ने शासक के दमन के विरुद्ध अभियान चलाया। उन्हें जेल में डाला गया, और 1946 में जेल में आग लगाए जाने के बाद उनकी मृत्यु हो गई — इस घटना पर देशभर में आक्रोश फैला। उन्हें राजस्थान के शहीदों में याद किया जाता है।
प्रजामंडलों से एकीकरण तक
1947 में स्वतंत्रता के बाद, प्रजामंडलों के नेताओं ने रियासतों के राजस्थान में एकीकरण और उसकी पहली सरकारों में केंद्रीय भूमिका निभाई — हीरालाल शास्त्री 1949 में वृहत् राजस्थान के पहले प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) बने, और माणिक्यलाल वर्मा तथा जयनारायण व्यास उसके प्रमुख राजनेताओं में थे (एकीकरण पर हमारा लेख देखें)।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- जयपुर में वर्धमान विद्यालय की स्थापना किसने की?
- कांग्रेस के किस अधिवेशन (1938) में रियासतों के आंदोलनों को समर्थन दिया गया?
- मारवाड़ लोक परिषद का नेतृत्व किसने किया?
- बीकानेर प्रजामंडल की स्थापना कहाँ हुई?
- सागरमल गोपा किस रियासत में शहीद हुए?
मुख्य परीक्षा (Mains) शैली (50 शब्द): प्रजामंडलों के उद्देश्य क्या थे?
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): "रियासतों की जनता ने दोहरा संघर्ष किया।" राजस्थान के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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