माउंट आबू के सबसे ऊँचे बिंदु गुरु शिखर पर आप समुद्र तल से लगभग 1,722 मीटर ऊपर, दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक पर खड़े होते हैं। अरावली का निर्माण पूर्व-कैम्ब्रियन (Precambrian) युग में हुआ — भू-वैज्ञानिक इसकी उत्पत्ति एक अरब वर्ष से भी पहले की मानते हैं — और समय के साथ घिसकर यह गोल पहाड़ियों और कटकों में बदल गई है। फिर भी यह प्राचीन, घिसी हुई पर्वतमाला आज भी उल्लेखनीय काम करती है: यह राजस्थान के मरुस्थल को उसके मैदानों से अलग करती है, उसकी नदियों को जल देती है, उसके खनिजों को सँजोए है, और थार के पूर्व की ओर बढ़ने की गति धीमी करती है।
विस्तार और दिशा
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कुल लंबाई | लगभग 692 किमी (पाठ्यपुस्तकों में प्रचलित आँकड़ा; अनुमान अलग-अलग हैं), गुजरात (पालनपुर/खेड़ब्रह्मा के पास) से दिल्ली (दिल्ली रिज) तक |
| राजस्थान में लंबाई | लगभग 550 किमी — पर्वतमाला का लगभग 80% |
| दिशा | दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व, राज्य के आर-पार तिरछी |
| राजस्थान के क्षेत्रफल में हिस्सा | लगभग दसवाँ भाग |
| ऊँचाई | सामान्यतः कम; दक्षिण-पश्चिम (माउंट आबू) में सबसे ऊँची, उत्तर-पूर्व की ओर कम होती जाती है |
भू-विज्ञान
- अरावली प्राचीन विवर्तनिक (tectonic) हलचलों से बने वलित पर्वत (fold mountains) हैं।
- ये अरावली और दिल्ली महासमूह (supergroup) की चट्टानों से बने हैं — जो भारत की सबसे पुरानी शैल-संरचनाओं में से हैं।
- लंबे अपरदन ने इन्हें अवशिष्ट पर्वत (residual mountains) बना दिया है — नीचे, गोल और कटकों में टूटे हुए।
प्रमुख चोटियाँ
| चोटी | ऊँचाई (लगभग) | स्थान |
|---|---|---|
| गुरु शिखर | 1,722 मीटर | माउंट आबू (सिरोही) — राजस्थान में सबसे ऊँची |
| सेर | 1,597 मीटर | सिरोही |
| दिलवाड़ा | 1,442 मीटर | माउंट आबू |
| जरगा | 1,431 मीटर | उदयपुर |
| अचलगढ़ | 1,380 मीटर | माउंट आबू |
अरावली के भाग
भूगोलवेत्ता इस पर्वतमाला को तीन भागों में बाँटते हैं:
- दक्षिणी अरावली — सबसे ऊँचा और सबसे ऊबड़-खाबड़ भाग, सिरोही, उदयपुर और राजसमंद में; इसमें माउंट आबू और भोराट का पठार शामिल हैं।
- मध्य अरावली — अजमेर के आसपास; बीच-बीच में अंतराल वाली नीची पहाड़ियाँ (जैसे अजमेर के पास नाग पहाड़, जहाँ से लूनी निकलती है)।
- उत्तरी अरावली — जयपुर, अलवर और सीकर-झुंझुनूं में; दिल्ली की ओर फैली बिखरी पहाड़ियाँ।
पर्वतमाला बीच-बीच में दर्रों (जिन्हें स्थानीय रूप से नाल कहते हैं) से कटी है, जैसे देसूरी की नाल और हल्दीघाटी, जो ऐतिहासिक रूप से मेवाड़ को मारवाड़ से जोड़ते थे और युद्ध में महत्वपूर्ण थे।
अरावली का महत्व
| भूमिका | व्याख्या |
|---|---|
| जल-विभाजक (water divide) | पर्वतमाला के पूर्व की नदियाँ (बनास, चंबल की सहायक नदियाँ) बंगाल की खाड़ी में जाती हैं; पश्चिम की नदियाँ (लूनी, साबरमती, पश्चिमी बनास) अरब सागर की ओर या मरुस्थल में बहती हैं |
| जलवायु | ये अरब सागर से आने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवाओं के समानांतर फैली हैं, इसलिए उन हवाओं को रोकती नहीं — यही एक कारण है कि पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा होती है। अपने पवनमुखी ढलानों पर ये कुछ वर्षा अवश्य कराती हैं; माउंट आबू में राजस्थान की सबसे अधिक वर्षा होती है |
| मरुस्थलीकरण के विरुद्ध अवरोध | ये रेत और गर्म हवाओं के मैदानों की ओर पूर्व में फैलाव को रोकने में मदद करती हैं |
| खनिज | जस्ता, सीसा, ताँबा, संगमरमर, ग्रेनाइट, अभ्रक आदि से समृद्ध (जावर, रामपुरा-आगूचा, खेतड़ी, मकराना क्षेत्र) |
| वन और वन्यजीव | अभयारण्यों और रिज़र्व का घर — माउंट आबू, कुंभलगढ़, सरिस्का, टॉडगढ़-रावली — और वन्यजीव गलियारे |
| भूजल पुनर्भरण | पहाड़ियाँ और वन जयपुर, अजमेर, उदयपुर और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के जलभृतों (aquifers) को फिर से भरते हैं |
| इतिहास और संस्कृति | क़िले, दर्रे और पहाड़ी राज्य — चित्तौड़, कुंभलगढ़, आमेर |
ख़तरे
- खनन — पत्थर, संगमरमर और खनिजों के वैध और अवैध खनन ने पहाड़ियों को काट दिया है।
- वनों की कटाई — ईंधन, चराई और निर्माण के लिए वनों का नुकसान।
- शहरीकरण — विशेषकर जयपुर, उदयपुर और पर्वतमाला के दिल्ली-NCR वाले सिरे के पास।
- पहाड़ियों और जल-स्रोतों पर अतिक्रमण।
- पर्वतमाला में अंतराल — जिनसे होकर रेत और धूल पूर्व की ओर बढ़ती है।
उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) ने अरावली में खनन और निर्माण पर बार-बार हस्तक्षेप किया है। किसे "अरावली पहाड़ियाँ" माना जाए — और इसलिए कहाँ खनन प्रतिबंधित हो — इसकी क़ानूनी परिभाषा हाल में बहस का विषय रही है।
संरक्षण
- अरावली ग्रीन वॉल परियोजना (2023 में शुरू) का लक्ष्य भारत की भूमि-पुनर्स्थापन प्रतिबद्धताओं के तहत गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में पर्वतमाला के साथ-साथ एक पट्टी में क्षरित भूमि को फिर से हरा-भरा करना है।
- संरक्षित क्षेत्र और पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र (eco-sensitive zones)।
- सामुदायिक वन प्रबंधन और जलग्रहण (watershed) कार्यक्रम।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- राजस्थान के भीतर अरावली की लंबाई कितनी है?
- अरावली की सबसे ऊँची चोटी कौन-सी है, और वह कितनी ऊँची है?
- अरावली किस दिशा में फैली है?
- राजस्थान में सबसे अधिक वर्षा किस स्थान पर होती है?
- अरावली ग्रीन वॉल परियोजना कब शुरू हुई?
मुख्य परीक्षा शैली (50 शब्द): अरावली पश्चिमी राजस्थान में अधिक वर्षा क्यों नहीं करा पाती?
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): अरावली के पारिस्थितिक महत्व और उसके सामने के ख़तरों की विवेचना कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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