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आज के हरियाणा में थानेसर के पास तराइन के मैदान में लगातार दो वर्षों में हुए दो युद्धों ने भारतीय इतिहास की धारा बदल दी। 1191 में अजमेर और दिल्ली के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय ने आक्रमणकारी मुहम्मद ग़ोरी को हराया। 1192 में मुहम्मद बेहतर तैयारी वाली सेना के साथ लौटा और निर्णायक रूप से जीता। कुछ ही वर्षों में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हो गई। पृथ्वीराज एक किंवदंती बन गए, जिनका गुणगान चारण-भाट सदियों तक करते रहे। लेकिन चौहानों की कहानी तराइन से बहुत पहले शुरू होती है, और उसके बहुत बाद तक चलती है।
उत्पत्ति: सांभर
आरंभिक चौहानों ने विशाल खारे पानी की झील के किनारे बसे शाकंभरी, यानी आज के सांभर, से शासन किया। परंपरा वासुदेव को संस्थापक मानती है, संभवतः सातवीं शताब्दी में। कुछ समय तक चौहान गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत रहे, और प्रतिहार साम्राज्य के कमज़ोर पड़ने पर स्वतंत्र हो गए।
अजमेर के शासक
| शासक | काल (लगभग) | योगदान |
|---|---|---|
| अजयराज | बारहवीं शताब्दी का आरंभ | अजयमेरु — यानी अजमेर — और तारागढ़ (गढ़ बीठली) किले की स्थापना |
| अर्णोराज (आनाजी) | बारहवीं शताब्दी का मध्य | अजमेर में आनासागर झील बनवाई; तुर्क आक्रमणकारियों से लड़े |
| विग्रहराज चतुर्थ (वीसलदेव) | लगभग 1150–1164 | तोमरों से दिल्ली जीती; अजमेर में एक संस्कृत महाविद्यालय बनवाया; हरकेलि नाटक लिखा; कवि-बांधव कहलाए |
| पृथ्वीराज तृतीय | लगभग 1177–1192 | चंदेलों, चालुक्यों और गहड़वालों से लड़े; तराइन में विजय (1191); पराजय और मृत्यु (1192) |
विग्रहराज चतुर्थ द्वारा बनवाया गया संस्कृत महाविद्यालय ग़ोरी की विजय के बाद एक मस्जिद में बदल दिया गया, जिसे अढ़ाई दिन का झोंपड़ा कहते हैं। वहाँ पत्थर की पट्टियों पर उत्कीर्ण उनके नाटक के अंश मिले हैं — पत्थर पर बची किसी राजकीय साहित्यिक कृति का यह दुर्लभ उदाहरण है।
पृथ्वीराज तृतीय और तराइन
पृथ्वीराज कम आयु में गद्दी पर बैठे और जल्दी ही अपने सैनिक अभियानों के लिए प्रसिद्ध हो गए — बुंदेलखंड के चंदेलों के विरुद्ध (महोबा का युद्ध), गुजरात के चालुक्यों के विरुद्ध, और कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद से प्रतिद्वंद्विता में।
| युद्ध | वर्ष | परिणाम |
|---|---|---|
| तराइन का प्रथम युद्ध | 1191 | पृथ्वीराज ने मुहम्मद ग़ोरी को हराया; मुहम्मद घायल होकर लौट गया |
| तराइन का द्वितीय युद्ध | 1192 | मुहम्मद घुड़सवार तीरंदाज़ों की बड़ी और अधिक गतिशील सेना के साथ लौटा; पृथ्वीराज पराजित हुए, बंदी बनाए गए और मारे गए |
इतिहासकार इस पराजय के कई कारण बताते हैं: मुहम्मद की बेहतर घुड़सवार रणनीति और अनुशासन; राजपूत शासकों के बीच फूट (जयचंद पृथ्वीराज के साथ नहीं आए); पहली विजय के बाद का अति-आत्मविश्वास; और गतिशील आरक्षित टुकड़ियों के बजाय विशाल सेना के एक साथ प्रयोग पर राजपूतों की निर्भरता।
इसके परिणाम दूरगामी थे: दिल्ली और अजमेर ग़ोरी के नियंत्रण में चले गए, और कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी।
स्रोत और किंवदंतियाँ
| स्रोत | प्रकृति |
|---|---|
| जयानक का पृथ्वीराजविजय | पृथ्वीराज के जीवनकाल में रचित एक संस्कृत काव्य; ऐतिहासिक दृष्टि से मूल्यवान |
| चंद बरदाई का पृथ्वीराज रासो | हिंदी (पिंगल) का एक वीर-काव्य; उपलब्ध पाठ में बाद में जोड़ी गई बहुत-सी सामग्री है |
| फ़ारसी इतिहास-ग्रंथ (जैसे मिनहाज-उस-सिराज का तबकात-ए-नासिरी) | ग़ोरी पक्ष का दृष्टिकोण |
प्रसिद्ध कहानियाँ — जयचंद की पुत्री संयोगिता के साथ पृथ्वीराज का भाग जाना, या आवाज़ के सहारे चलाए गए बाण से मुहम्मद ग़ोरी को अंधा कर देना — रासो और बाद की परंपरा से आती हैं। ये राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं, पर इतिहासकार इन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं मानते।
चौहानों की बाद की शाखाएँ
चौहानों की कहानी 1192 में समाप्त नहीं हुई। इस वंश की शाखाओं ने राजस्थान में अन्य जगहों पर शासन किया और दिल्ली सल्तनत का डटकर प्रतिरोध किया।
| शाखा | केंद्र | प्रमुख घटना |
|---|---|---|
| रणथंभौर के चौहान | रणथंभौर (सवाई माधोपुर) | हम्मीर देव ने अपनी शरण में आए मंगोल विद्रोहियों को सौंपने से इनकार कर दिया; अलाउद्दीन खिलजी ने किले को घेरा और 1301 में उस पर अधिकार कर लिया; रक्षकों ने मृत्यु का वरण किया — साका और जौहर |
| जालोर के चौहान (सोनगरा) | जालोर | कान्हड़देव ने अलाउद्दीन का प्रतिरोध किया; 1311 में जालोर का पतन हुआ; यह कथा पद्मनाभ के कान्हड़दे प्रबंध में वर्णित है |
| हाड़ा चौहान | बूंदी और कोटा | आधुनिक काल तक हाड़ौती क्षेत्र पर शासन किया; सत्रहवीं शताब्दी में कोटा बूंदी से अलग हुआ |
हम्मीर की कथा नयचंद्र सूरि के हम्मीर महाकाव्य में, और बाद के साहित्य तथा लोकगीतों में गाई गई है।
चौहान क्यों महत्वपूर्ण हैं
- अजमेर — उनका बसाया नगर राजस्थान का राजनीतिक केंद्र बना और बाद में ब्रिटिश मुख्यालय।
- तराइन — भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़।
- संस्कृति — विग्रहराज चतुर्थ का संस्कृत को संरक्षण; रासो की चारण-भाट परंपरा।
- प्रतिरोध — रणथंभौर और जालोर राजपूत प्रतिरोध के प्रतीक बने।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- अजमेर की स्थापना किसने की?
- किस चौहान शासक ने हरकेलि नाटक लिखा?
- अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मूल रूप से क्या था?
- तराइन के दोनों युद्ध किन वर्षों में लड़े गए?
- पद्मनाभ की कौन-सी रचना जालोर के प्रतिरोध का वर्णन करती है?
मुख्य परीक्षा (Mains) शैली (50 शब्द): ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में पृथ्वीराजविजय और पृथ्वीराज रासो में अंतर स्पष्ट कीजिए।
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय की पराजय के कारणों का परीक्षण कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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