इस गाइड में
जब पुरातत्वविदों ने आज के हनुमानगढ़ ज़िले में कालीबंगा में घग्घर नदी के सूखे तल के किनारे एक टीले की खुदाई की, तो हड़प्पाई नगर के नीचे उन्हें कुछ अद्भुत मिला: एक जुता हुआ खेत, जिसकी हल-रेखाएँ चार हज़ार वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी दिखाई दे रही थीं। ये रेखाएँ एक-दूसरे को आड़ी-तिरछी काटती हैं — ठीक उसी तरह जैसे इस क्षेत्र के किसान आज भी दो फ़सलें एक साथ उगाने के लिए खेत जोतते हैं। यह दुनिया में कहीं भी ज्ञात सबसे पुराने जुते हुए खेतों में से एक है। राजस्थान का सुदूर अतीत ऐसी खोजों से भरा है, और RAS परीक्षा इनके बारे में नियमित रूप से प्रश्न पूछती है।
एक लंबी झलक
| काल | राजस्थान के प्रमुख स्थल | ये क्या दर्शाते हैं |
|---|---|---|
| पुरापाषाण काल (Palaeolithic; पुराना पाषाण युग) | बनास, बेड़च, चंबल और लूणी की घाटियों में | हस्त-कुठार (hand-axe) और विदारणी (cleaver); शिकारी-संग्राहक |
| मध्यपाषाण काल (Mesolithic) | बागोर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर) | सूक्ष्म पाषाण उपकरण (microliths); पशुपालन के आरंभिक साक्ष्य |
| पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा काल | कालीबंगा (हनुमानगढ़) | नियोजित बस्ती, अग्नि वेदिकाएँ, जुता हुआ खेत |
| ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic; ताँबा-पत्थर) | गणेश्वर (सीकर), आहड़, गिलूंड, बालाथल (मेवाड़) | ताँबे का काम; ग्रामीण कृषक संस्कृतियाँ |
| लौह युग | चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) स्थल, जैसे नोह (भरतपुर) | लोहे का उपयोग; गंगा के मैदान से संबंध |
बागोर: आरंभिक पशुपालक
भीलवाड़ा ज़िले में कोठारी नदी के तट पर स्थित बागोर का उत्खनन 1960 के दशक के अंत में वी. एन. मिश्र ने किया। यह भारत के सबसे बड़े मध्यपाषाणकालीन स्थलों में से एक है। सूक्ष्म पाषाण उपकरणों, पशुओं की हड्डियों और बाद के मिट्टी के बर्तनों की परतें एक लंबे क्रम की ओर संकेत करती हैं, जिसमें शिकारी-संग्राहकों ने पालतू भेड़-बकरियाँ रखना शुरू किया — यह उपमहाद्वीप में ऐसे सबसे आरंभिक साक्ष्यों में से है।
कालीबंगा: रेगिस्तान में एक हड़प्पाई नगर
कालीबंगा ("काली चूड़ियाँ", यहाँ की सतह पर मिले टूटी चूड़ियों के टुकड़ों के कारण) अब सूख चुकी घग्घर नदी के बाएँ तट पर है। अनेक विद्वान घग्घर को प्राचीन सरस्वती मानते हैं। इस स्थल की ओर सबसे पहले बीसवीं सदी के आरंभ में इतालवी विद्वान एल. पी. तैस्सितोरी का ध्यान गया, और 1960 के दशक में बी. बी. लाल और बी. के. थापर ने इसका व्यवस्थित उत्खनन किया।
इसकी मुख्य विशेषताएँ:
- दो चरण — एक पूर्व-हड़प्पा बस्ती और उसके ऊपर एक विकसित हड़प्पाई नगर।
- पूर्व-हड़प्पा चरण का एक जुता हुआ खेत, जिसकी हल-रेखाएँ जाली (grid) के रूप में हैं।
- अग्नि वेदिकाएँ — राख और पशुओं की हड्डियों वाले गड्ढों की पंक्तियाँ, जो कर्मकांडों की ओर संकेत करती हैं।
- हड़प्पाई नियोजन के अनुरूप एक दुर्ग (citadel) और एक निचला नगर (lower town), दोनों किलेबंद।
- कच्ची ईंटों का निर्माण, मोहनजोदड़ो की पकी ईंटों से अलग।
- कुछ विद्वानों के अनुसार भूकंप से हुई क्षति के साक्ष्य।
गणेश्वर: ताँबे का गाँव
खेतड़ी पट्टी के समृद्ध ताँबा भंडारों के पास, सीकर क्षेत्र में स्थित गणेश्वर से हज़ारों ताँबे की वस्तुएँ मिली हैं — बाणाग्र, भाले की नोकें, मछली पकड़ने के काँटे, चूड़ियाँ और कुल्हाड़ियाँ। 1970 के दशक के अंत में आर. सी. अग्रवाल और उनके सहयोगियों ने इसका उत्खनन किया। यह गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का प्रारूप-स्थल (type-site) है, जिसका काल मोटे तौर पर ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी सहस्राब्दी माना जाता है।
हड़प्पाई नगरों को ताँबे की ज़रूरत थी, और खेतड़ी पट्टी भारत के प्रमुख ताँबा स्रोतों में से एक है। इसलिए अनेक विद्वान मानते हैं कि गणेश्वर और उससे जुड़े स्थल हड़प्पावासियों को ताँबा आपूर्ति करते थे। इसे कभी-कभी "भारत की ताम्र संस्कृतियों की जननी" भी कहा जाता है।
आहड़ और बनास संस्कृति
आहड़ संस्कृति (जिसे नदी के नाम पर बनास संस्कृति भी कहते हैं) ईसा पूर्व तीसरी और दूसरी सहस्राब्दी में दक्षिण-पूर्वी राजस्थान — मेवाड़ क्षेत्र — में फली-फूली।
| स्थल | ज़िला | टिप्पणी |
|---|---|---|
| आहड़ | उदयपुर | प्रारूप-स्थल; प्राचीन नाम ताम्रवती ("ताँबे का स्थान"); ताँबे के उपकरण और ताँबा गलाने के साक्ष्य; काले और लाल मृद्भांड (black-and-red ware) |
| गिलूंड | राजसमंद | कच्ची ईंटों की संरचनाओं और भंडारण के साक्ष्यों वाला एक बड़ा टीला |
| बालाथल | उदयपुर | एक किलेबंद गाँव; यहाँ से भारत के सबसे पुराने कंकालों में से एक मिला, जिसमें कुष्ठ रोग के साक्ष्य हैं |
बनास संस्कृति के लोग पत्थर और मिट्टी के घरों में रहते थे, गेहूँ, जौ और मोटे अनाज जैसी फ़सलें उगाते थे, मवेशी पालते थे और ताँबे का व्यापक उपयोग करते थे। उनके विशिष्ट काले और लाल मृद्भांड, जिन पर अक्सर सफ़ेद रंग से चित्रकारी होती थी, इस संस्कृति की पहचान हैं।
ये स्थल क्यों महत्वपूर्ण हैं
- कृषि — कालीबंगा का जुता हुआ खेत हल चलाने के सबसे आरंभिक प्रत्यक्ष साक्ष्यों में से है।
- धातुकर्म — गणेश्वर और आहड़ राजस्थान की खनिज संपदा पर आधारित, ताँबे के आरंभिक और व्यापक काम को दर्शाते हैं।
- पर्यावरण — घग्घर के स्थल थार क्षेत्र में जलवायु और नदियों में आए बदलाव पर प्रश्न उठाते हैं।
- निरंतरता — कालीबंगा के खेत का पैटर्न और आहड़ के कृषक गाँव राजस्थान के बाद के ग्रामीण जीवन से लंबी निरंतरता की ओर संकेत करते हैं।
RAS इनके बारे में कैसे पूछता है
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के प्रश्न आम तौर पर तथ्यात्मक होते हैं — कौन-सा स्थल घग्घर के तट पर है? किस संस्कृति को ताम्रवती कहा जाता है? अग्नि वेदिकाएँ कहाँ मिलीं? बागोर का उत्खनन किसने किया? मुख्य परीक्षा (Mains) में आपसे किसी स्थल की विशेषताओं का 50 शब्दों में वर्णन करने या राजस्थान की आद्य-ऐतिहासिक (protohistoric) संस्कृतियों के महत्व की 100 शब्दों में विवेचना करने को कहा जा सकता है। स्थलों, ज़िलों, नदियों, उत्खननकर्ताओं और मुख्य खोजों की एक पृष्ठ की तालिका बनाएँ, और उसका बार-बार दोहराव (revision) करें।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा शैली:
- कालीबंगा किस नदी के तट पर स्थित है?
- आहड़ का प्राचीन नाम क्या था?
- कोठारी नदी के तट पर स्थित कौन-सा मध्यपाषाणकालीन स्थल पशुपालन के आरंभिक साक्ष्य दर्शाता है?
- किस स्थल को हड़प्पावासियों के लिए ताँबे का प्रमुख आपूर्तिकर्ता माना जाता है?
- कुष्ठ रोग के साक्ष्य वाला सबसे पुराने कंकालों में से एक कहाँ मिला?
मुख्य परीक्षा शैली (50 शब्द): कालीबंगा की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): राजस्थान के इतिहास में आहड़-बनास संस्कृति के महत्व की विवेचना कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
अगली RAS गाइड ईमेल पर पाएँ
हर हफ़्ते नई गाइड। कोई स्पैम नहीं, जब चाहें सदस्यता छोड़ें।