इस गाइड में
1973 में भारतीय डाक ने एक डाक टिकट जारी किया, जिसमें एक स्त्री का पार्श्व-चित्र था — असंभव-सी लंबी, घुमावदार आँख, तीखी नाक और कोमल नैन-नक्श, ओढ़नी से घिरा चेहरा। यह थी बणी-ठणी, जिसे अठारहवीं शताब्दी में किशनगढ़ के दरबार में निहालचंद ने चित्रित किया था। इस चित्र को "भारत की मोनालिसा" कहा गया है, और यह राजस्थानी चित्रकला की सबसे प्रसिद्ध छवियों में से एक है — एक ऐसी परंपरा, जिसमें अनेक क्षेत्रीय शैलियाँ हैं और हर शैली की अपनी शैलीगत पहचान, रंग और विषय हैं।
राजस्थानी चित्रकला क्या है?
मोटे तौर पर सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक राजस्थान के दरबारों ने लघुचित्रों (miniature) को संरक्षण दिया — अधिकतर कागज़ पर, पांडुलिपियों के चित्रों और एल्बमों के रूप में — और साथ ही कपड़े और दीवारों पर बड़े चित्रों को भी। इन शैलियों में कुछ समान विशेषताएँ हैं:
- चटख, सपाट रंग (लाल, पीला, हरा, नीला);
- धार्मिक विषय, विशेषकर कृष्ण और राम की कथाएँ, गीत गोविंद, भागवत पुराण;
- रागमाला (संगीत के रागों को दृश्यों के रूप में दिखाना) और बारहमासा (बारह महीने);
- दरबारी जीवन, व्यक्ति-चित्र, शोभायात्राएँ और शिकार;
- अलंकरण और पैटर्न की गहरी समझ।
समय के साथ मुग़ल चित्रकला के संपर्क से अधिक स्वाभाविकता, व्यक्ति-चित्रण और बारीक विवरण आया — पर हर शैली का स्थानीय चरित्र मिटा नहीं।
विद्वान प्रायः इन शैलियों को चार बड़े समूहों (स्कूलों) में बाँटते हैं:
| समूह | शैलियाँ |
|---|---|
| मेवाड़ | उदयपुर, चावंड, नाथद्वारा, देवगढ़ |
| मारवाड़ | जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, नागौर, पाली |
| हाड़ौती | बूँदी, कोटा |
| ढूंढाड़ | आमेर–जयपुर, अलवर, शेखावाटी, उणियारा |
प्रमुख शैलियाँ
मेवाड़
- सबसे प्रारंभिक शैलियों में से एक। अमरसिंह के शासनकाल में 1605 में चावंड में चित्रकार निसारदी (नसीरुद्दीन) ने एक प्रसिद्ध रागमाला चित्र-श्रृंखला बनाई।
- साहिबदीन (सत्रहवीं शताब्दी) ने रामायण और भागवत पुराण की प्रसिद्ध सचित्र पांडुलिपियाँ बनाईं।
- विशेषताएँ: गहरे रंग (लाल और पीला), शैलीबद्ध आकृतियाँ, मछली जैसी (मीनाकृति) आँखें।
नाथद्वारा
- मेवाड़ शैली की एक उपशाखा, जिसका केंद्र पुष्टिमार्ग परंपरा का श्रीनाथजी मंदिर है।
- पिछवाइयों के लिए प्रसिद्ध — श्रीनाथजी की प्रतिमा के पीछे लगाए जाने वाले बड़े चित्रित कपड़े, जिनमें ऋतुओं और त्योहारों के दृश्यों में कृष्ण को दिखाया जाता है।
मारवाड़ (जोधपुर)
- गहरे रंग, मज़बूत रेखाएँ, और लोक प्रेमकथाओं (जैसे ढोला–मारू), दरबारी जीवन और व्यक्ति-चित्रों के विषय।
- जोधपुर के मानसिंह (उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ) जैसे शासकों के समय फली-फूली; मानसिंह नाथ संप्रदाय के संरक्षक थे।
किशनगढ़
- अठारहवीं शताब्दी के मध्य में राजा सावंतसिंह (जो नागरीदास नाम से कविता लिखते थे) के समय, चित्रकार निहालचंद के साथ, अपने चरम पर पहुँची।
- विशेषताएँ: लंबी कमलनयन आँखें, धनुषाकार भौंहें, तीखी नाक, छरहरी आकृतियाँ, और झीलों व प्राकृतिक दृश्यों के बीच राधा और कृष्ण के प्रेम-दृश्य।
- बणी-ठणी — जिसे अनेक लोग सावंतसिंह के दरबार की एक गायिका से प्रेरित मानते हैं — इस शैली की पहचान है।
बूँदी और कोटा (हाड़ौती)
- बूँदी: हरे-भरे प्राकृतिक दृश्य, वर्षा ऋतु के दृश्य, गहरे हरे रंग, पशु और पक्षी; बूँदी महल की चित्रशाला में भित्तिचित्र सुरक्षित हैं।
- कोटा: शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध — घने जंगलों में बाघ का शिकार करते शासक — जिन्हें ऊर्जा और गति के साथ चित्रित किया गया है।
आमेर–जयपुर
- मुग़ल प्रभाव गहरा; बड़े व्यक्ति-चित्र, दरबारी दृश्य और धार्मिक विषय।
- सवाई जयसिंह द्वितीय और विशेषकर सवाई प्रतापसिंह के समय फली-फूली।
बीकानेर
- मुग़ल चित्रकला का गहरा प्रभाव; कई चित्रकार मुग़ल चित्रशालाओं से आए थे।
- यहाँ उस्ता चित्रकारों (जैसे अली रज़ा और रुकनुद्दीन) ने काम किया। बीकानेर उस्ता कला के लिए भी प्रसिद्ध है — ऊँट की खाल पर सोने की उभरी हुई नक्काशी।
अलवर
- बाद की शैली (अठारहवीं शताब्दी के अंत से उन्नीसवीं शताब्दी), जिसमें जयपुर और मुग़ल शैलियों का मेल है; बारीक पांडुलिपि-चित्रण के लिए प्रसिद्ध।
लोक चित्रकला की परंपराएँ
| रूप | कहाँ | क्या है |
|---|---|---|
| फड़ | शाहपुरा और भीलवाड़ा | लंबे चित्रित कपड़े के पट (scroll), जिन पर लोक देवताओं पाबूजी और देवनारायण की गाथाएँ चित्रित होती हैं; भोपा पुजारी-गायक रात में इनका वाचन करते हैं; परंपरागत रूप से जोशी परिवार इन्हें चित्रित करता है |
| कावड़ | बस्सी (चित्तौड़गढ़) | लकड़ी का एक सुवाह्य (portable) मंदिर, जिसके चित्रित पट कथावाचक के कथा कहने के साथ किताब की तरह खुलते जाते हैं |
| मांडणा | पूरे ग्रामीण राजस्थान में | त्योहारों पर महिलाओं द्वारा बनाए जाने वाले भूमि और दीवार चित्र |
| सांझी | विभिन्न स्थान | स्टेंसिल से बनाए गए अलंकरण, विशेषकर वैष्णव पूजा में |
राजस्थानी चित्रकला क्यों महत्वपूर्ण है
- यह भारत की महान कला परंपराओं में से एक है, जिसकी स्पष्ट क्षेत्रीय पहचानें हैं।
- यह धार्मिक भक्ति, दरबारी जीवन और प्रकृति को दर्ज करती है।
- यह मुग़लों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को दिखाती है।
- फड़ जैसे लोक रूप आज भी जीवित हैं और भौगोलिक संकेतक (GI tag) और शिल्प कार्यक्रमों से संरक्षित हैं।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- बणी-ठणी किस चित्रकार ने और किस दरबार में बनाई?
- कौन-सी शैली शिकार दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है?
- 1605 की रागमाला चित्र-श्रृंखला कहाँ बनाई गई?
- पिछवाई क्या हैं, और वे किस स्थान से जुड़ी हैं?
- फड़ चित्रों में किन लोक देवताओं को दिखाया जाता है?
मुख्य परीक्षा (Mains) शैली (50 शब्द): किशनगढ़ शैली की विशिष्ट विशेषताएँ क्या हैं?
मुख्य परीक्षा शैली (100 शब्द): चित्रकला की मेवाड़ और बूँदी शैलियों की तुलना कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Rajasthan Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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