जब 2000 में बिहार से अलग करके झारखंड बनाया गया, तो नया राज्य अपने साथ छोटानागपुर के जंगल और संथाल परगना की पहाड़ियाँ ले गया। पर उनका इतिहास आज भी बिहार के इतिहास का हिस्सा है — एक शताब्दी से अधिक समय तक ये क्षेत्र इसी प्रांत में थे, और उनके जनजातीय विद्रोहों पर BPSC के प्रश्नपत्रों में नियमित रूप से प्रश्न आते हैं।
जनजातियों ने विद्रोह क्यों किया
| कारण | व्याख्या |
|---|---|
| भूमि से बेदखली | औपनिवेशिक भूमि कानूनों और राजस्व बंदोबस्तों के कारण बाहरी लोग — ज़मींदार, व्यापारी, महाजन — आए और उन्होंने जनजातीय भूमि पर कब्ज़ा कर लिया |
| दिकू | जनजातीय समुदाय बाहरी लोगों को दिकू कहते थे; वे शोषण के प्रतीक बन गए |
| महाजन | ऊँची ब्याज दरों से लोग कर्ज़ की गुलामी (debt bondage) में फँस गए |
| वन कानून | झूम (स्थानांतरित) खेती, पशु चराने और वनोपज इकट्ठा करने पर प्रतिबंध |
| बेगार | ज़मींदारों और अधिकारियों के लिए बेठ-बेगारी (जबरन श्रम) |
| पुलिस और अदालतें | दूर, महँगी और जनजातीय रीति-रिवाजों के प्रति असंवेदनशील |
| मिशनरी और सांस्कृतिक बदलाव | पारंपरिक धर्म और संस्थाओं पर दबाव |
प्रमुख विद्रोह
तिलका माँझी (1780 का दशक)
- भागलपुर–राजमहल क्षेत्र में पहाड़िया समुदाय के एक नेता (परंपरा उन्हें संथाल भी बताती है)।
- उन्होंने 1780 के दशक में कंपनी के विरुद्ध प्रतिरोध का नेतृत्व किया। कहा जाता है कि उन्होंने भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर हमला किया था।
- उन्हें पकड़कर फाँसी दी गई (परंपरा के अनुसार 1785 में)।
- उन्हें अक्सर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध पहला आदिवासी विद्रोही कहा जाता है; तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय उन्हीं के नाम पर है।
कोल विद्रोह (1831–32)
- छोटानागपुर में मुंडा, उराँव और हो (जिन्हें अंग्रेज़ सामूहिक रूप से कोल कहते थे) उन बाहरी लोगों के विरुद्ध उठ खड़े हुए, जिन्होंने उनकी भूमि पर कब्ज़ा कर लिया था।
- नेताओं में बुधू भगत शामिल थे।
- विद्रोह को सेना ने दबा दिया; बाद में अंग्रेज़ों ने इस क्षेत्र के लिए एक विशेष प्रशासनिक व्यवस्था बनाई (दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी, South-West Frontier Agency, 1834)।
संथाल हूल (1855–56)
- कहाँ: दामिन-ए-कोह क्षेत्र (राजमहल की पहाड़ियाँ), जहाँ संथाल बस गए थे और उन्होंने ज़मीन साफ़ करके खेती योग्य बनाई थी।
- नेता: भाई सिद्धू और कान्हू मुर्मू, साथ में चाँद और भैरव, और उनकी बहनें फूलो और झानो।
- शुरुआत: 30 जून 1855 को हज़ारों संथाल भोगनाडीह में इकट्ठा हुए और उन्होंने ज़मींदारों, महाजनों और अधिकारियों के शोषण के अंत की घोषणा की।
- घटनाक्रम: उन्होंने महाजनों, पुलिस चौकियों और रेलवे कर्मचारियों पर हमले किए; अंग्रेज़ों ने मार्शल लॉ (सैनिक शासन) घोषित किया।
- दमन: 1856 के आरंभ तक विद्रोह कुचल दिया गया; कई हज़ार संथाल मारे गए; सिद्धू और कान्हू को फाँसी दी गई।
- परिणाम: अंग्रेज़ों ने विशेष प्रशासनिक सुरक्षा के साथ अलग संथाल परगना ज़िला (1855) बनाया।
30 जून को हूल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
बिरसा मुंडा और उलगुलान (1899–1900)
- छोटानागपुर के युवा मुंडा नेता बिरसा मुंडा (1875–1900) ने एक नए धर्म (बिरसाइत) का प्रचार किया। उन्होंने मुंडाओं से अंधविश्वास, शराब और बलि छोड़ने और अपनी ज़मीन वापस लेने का आह्वान किया।
- उन्होंने खूँटकट्टी व्यवस्था (जंगल को सबसे पहले साफ़ करने वालों का भूमि पर सामूहिक स्वामित्व) को फिर से लागू करने की माँग की।
- उनके आंदोलन उलगुलान ("महान हलचल") ने 1899–1900 में थानों, गिरजाघरों और ज़मींदारों की संपत्ति पर हमले किए।
- उन्हें पकड़ लिया गया और 9 जून 1900 को लगभग 25 वर्ष की आयु में राँची जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
- उनकी जयंती, 15 नवंबर, राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय गौरव दिवस (2021 से) के रूप में मनाई जाती है, और यही झारखंड का स्थापना दिवस भी है।
परिणाम: छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (Chotanagpur Tenancy Act), जिसने जनजातीय भूमि के गैर-जनजातीय लोगों को हस्तांतरण पर रोक लगाई।
ताना भगत आंदोलन (1914 से)
- 1914 में छोटानागपुर के उराँवों के बीच जतरा उराँव (जतरा भगत) के नेतृत्व में शुरू हुआ।
- एक धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन: शराब और मांस से परहेज़, भूत-प्रेत और बलि का त्याग, और बेगार तथा लगान का विरोध।
- बाद में ताना भगत गांधीवादी राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए और उन्होंने खादी और अहिंसा को अपनाया; वे गांधी के प्रति अपनी निष्ठा के लिए जाने जाते हैं।
औपनिवेशिक प्रतिक्रिया
| प्रतिक्रिया | व्याख्या |
|---|---|
| सैनिक दमन | हर बड़े विद्रोह को बलपूर्वक कुचला गया |
| विशेष प्रशासन | दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी (1834); संथाल परगना (1855) |
| संरक्षक कानून | छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908); बाद में संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम |
| गैर-विनियमित क्षेत्र (non-regulation areas) | कुछ कानून यहाँ अपने-आप लागू नहीं होते थे |
इन व्यवस्थाओं ने संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) को प्रभावित किया।
विरासत
- ये विद्रोह झारखंड की पहचान के केंद्र में हैं और बिहार में साझा इतिहास के हिस्से के रूप में याद किए जाते हैं।
- इन्होंने बाद के जनजातीय आंदोलनों को प्रेरित किया, जिनमें अलग झारखंड राज्य का आंदोलन भी शामिल है।
- संरक्षक काश्तकारी कानून आज भी महत्वपूर्ण हैं।
अभ्यास
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) शैली:
- अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध पहला आदिवासी विद्रोही अक्सर किसे कहा जाता है?
- संथाल हूल कब और कहाँ शुरू हुआ?
- बिरसा मुंडा किस व्यवस्था को फिर से लागू करना चाहते थे?
- बिरसा मुंडा के उलगुलान के बाद कौन-सा अधिनियम आया?
- ताना भगत आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
मुख्य परीक्षा (Mains) शैली:
- "जनजातीय विद्रोह भूमि, वन और पहचान की रक्षा के संघर्ष थे।" संथाल हूल और उलगुलान के संदर्भ में विवेचना कीजिए।
- जनजातीय विद्रोहों के प्रति औपनिवेशिक राज्य की प्रतिक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा उपायों में उसकी विरासत का परीक्षण कीजिए।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Bihar Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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