इस गाइड में
दिसंबर 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में चंपारण के एक काश्तकार किसान राजकुमार शुक्ल ने गांधी से अपने ज़िले में आने का अनुरोध किया। गांधी हाल ही में दक्षिण अफ़्रीका से लौटे थे। वे चंपारण के बारे में कुछ नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने बात टाल दी। शुक्ल उनके पीछे-पीछे कानपुर, फिर अहमदाबाद, फिर कलकत्ता गए, जब तक गांधी राज़ी नहीं हो गए। अप्रैल 1917 में गांधी बिहार आए। इसके बाद जो हुआ, वह भारत की धरती पर उनका पहला सत्याग्रह था, और इसी ने उन्हें राष्ट्रीय व्यक्तित्व बना दिया।
BPSC के लिए यह बिहार के इतिहास का बहुत उपयोगी विषय है: प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में तथ्यात्मक प्रश्न (तिथियाँ, शब्द, नाम), और मुख्य परीक्षा (Mains) के सामान्य अध्ययन (GS) प्रश्नपत्र I (GS Paper I) में गांधीवादी पद्धतियों या राष्ट्रीय आंदोलन में बिहार की भूमिका पर विश्लेषणात्मक प्रश्न।
पृष्ठभूमि: उत्तर बिहार में नील
नेपाल की सीमा पर बिहार के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित चंपारण उस समय बिहार और उड़ीसा प्रांत का हिस्सा था, जिसे 1912 में बंगाल से अलग किया गया था। ज़िले का बड़ा हिस्सा बेतिया राज जैसी बड़ी ज़मींदारियों का था, जो गाँवों को यूरोपीय बागान मालिकों को पट्टे पर दे देती थीं। फिर बागान मालिक काश्तकारों पर नियंत्रण रखते थे।
ये शब्द आपको ज़रूर आने चाहिए:
- तिनकठिया (Tinkathia): काश्तकारों को हर 20 कट्ठे (एक बीघा) में से 3 कट्ठे पर, यानी अपनी ज़मीन के 3/20 हिस्से पर, नील उगाना पड़ता था और उसे बागान मालिक द्वारा तय कीमत पर उसी को बेचना पड़ता था।
- शरहबेशी (Sharahbeshi): बढ़ा हुआ लगान। जब जर्मनी के कृत्रिम रंगों ने प्राकृतिक नील को घाटे का सौदा बना दिया, तो बागान मालिकों ने ऊँचे लगान के बदले काश्तकारों को नील की खेती से मुक्त कर दिया।
- तावान (Tawan): नील की बाध्यता से मुक्ति के बदले काश्तकारों से वसूली गई एकमुश्त रकम।
- अबवाब (Abwab): लगान के ऊपर वसूले जाने वाले अवैध उपकर।
नील की शिकायत पुरानी थी: पहले 1859–60 का बंगाल नील विद्रोह हुआ था, जिसे दीनबंधु मित्र के नाटक नील दर्पण में दिखाया गया। चंपारण के काश्तकारों ने भी 1907–08 के आसपास बेतिया क्षेत्र में विरोध किया था, पर कोई स्थायी राहत नहीं मिली।
एक नज़र में घटनाक्रम
| तिथि | घटना |
|---|---|
| दिसंबर 1916 | लखनऊ कांग्रेस में राजकुमार शुक्ल गांधी से मिले |
| अप्रैल 1917 | गांधी पटना पहुँचे, फिर मुज़फ़्फ़रपुर, जहाँ जे. बी. कृपलानी ने उनका स्वागत किया |
| 15 अप्रैल 1917 | गांधी ज़िला मुख्यालय मोतिहारी पहुँचे |
| अप्रैल 1917 | ज़िला छोड़ने का आदेश मिला; गांधी ने इनकार किया; बाद में मुकदमा वापस लिया गया |
| 1917 का मध्य | चंपारण कृषि जाँच समिति नियुक्त हुई, जिसमें गांधी सदस्य थे |
| 1917 का अंत | बड़हरवा और भितिहरवा सहित गाँवों में स्कूल शुरू हुए |
| 1918 | चंपारण कृषि अधिनियम ने तिनकठिया समाप्त किया |
| 1918 | खेड़ा सत्याग्रह और अहमदाबाद मिल हड़ताल |
| 2017 | शताब्दी मनाई गई |
मोतिहारी में गांधी
गांधी 15 अप्रैल 1917 को मोतिहारी पहुँचे। ज़िला अधिकारियों ने उन्हें चंपारण छोड़ने का आदेश थमा दिया। उन्होंने जवाब दिया कि वे नहीं जाएँगे और दंड स्वीकार करेंगे। अदालत में उन्होंने कहा कि उन्होंने आदेश की अवहेलना सत्ता के प्रति अनादर के कारण नहीं, बल्कि "हमारे अस्तित्व के उच्चतर नियम, अंतरात्मा की आवाज़" का पालन करते हुए की है।
अदालत के बाहर भीड़ जमा थी। सरकार ने मुकदमा वापस ले लिया और उन्हें अपनी जाँच जारी रखने दी।
इस छोटे-से प्रसंग में सत्याग्रह की पूरी पद्धति समाई है:
- अन्यायपूर्ण आदेश को खुलकर तोड़ो, छिपकर नहीं।
- अहिंसक रहो।
- कानूनी परिणाम स्वीकार करो।
- नैतिक बोझ वापस सरकार पर डाल दो।
जाँच और टीम
गांधी ने आंदोलन से नहीं, प्रमाण से शुरुआत की। उनकी टीम ने हज़ारों किसानों के बयान दर्ज किए और उनकी जाँच की, ताकि बागान मालिक उन्हें अफ़वाह कहकर खारिज न कर सकें।
इस टीम में बिहार और भारत के भावी नेता शामिल थे:
- राजेंद्र प्रसाद, जो बाद में भारत के पहले राष्ट्रपति बने और जिन्होंने Satyagraha in Champaran पुस्तक लिखी;
- ब्रजकिशोर प्रसाद, दरभंगा के वकील, जिन्होंने पहले भी काश्तकारों का मामला उठाया था;
- अनुग्रह नारायण सिन्हा, जो बाद में बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बने;
- जे. बी. कृपलानी, जो उस समय मुज़फ़्फ़रपुर में पढ़ा रहे थे;
- महादेव देसाई, जो गांधी के सचिव बने;
- मज़हरुल हक़ जैसे समर्थक।
समिति और अधिनियम
प्रमाणों के दबाव में सरकार ने 1917 में चंपारण कृषि जाँच समिति (Champaran Agrarian Committee) नियुक्त की और गांधी को उसका सदस्य बनाया। इसकी सिफ़ारिशों पर चंपारण कृषि अधिनियम, 1918 (Champaran Agrarian Act) ने:
- तिनकठिया प्रथा समाप्त की;
- बढ़े हुए लगान (शरहबेशी) को घटाया;
- तावान की आंशिक वापसी का आदेश दिया, जिसे आम तौर पर लगभग 25 प्रतिशत बताया जाता है।
गांधी ने आंशिक वापसी स्वीकार कर ली। आम तौर पर बताया जाने वाला उनका तर्क यह था कि रकम से ज़्यादा महत्वपूर्ण सिद्धांत है: बागान मालिकों को मानना पड़ा कि वे गलत थे। लगभग एक दशक के भीतर ज़्यादातर बागान मालिक चंपारण छोड़ चुके थे।
रचनात्मक कार्य
गांधी ने चंपारण में रचनात्मक कार्य (constructive work) को भी परखा। स्वयंसेवकों ने बड़हरवा और भितिहरवा सहित कई जगहों पर गाँवों में स्कूल खोले; भितिहरवा आश्रम आज भी मौजूद है। उन्होंने स्वच्छता, बुनियादी स्वास्थ्य और सफ़ाई पर काम किया, और कस्तूरबा गांधी भी इस प्रयास में शामिल हुईं। विरोध के साथ पुनर्निर्माण की यह जोड़ी गांधीवादी कार्यक्रम का स्थायी हिस्सा बन गई।
चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद की तुलना
| विशेषता | चंपारण (1917) | खेड़ा (1918) | अहमदाबाद (1918) |
|---|---|---|---|
| कौन | नील उगाने वाले काश्तकार | खेड़ा, गुजरात के किसान | कपड़ा मिल मज़दूर |
| मुद्दा | तिनकठिया, अवैध वसूली | फसल खराब होने के बावजूद राजस्व वसूली | मज़दूरी (प्लेग बोनस विवाद) |
| पद्धति | सविनय अवज्ञा, जाँच | लगान न देने का अभियान | हड़ताल; भारत में गांधी का पहला उपवास |
| सहयोगी | राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद | वल्लभभाई पटेल | अनसूया साराभाई |
| परिणाम | 1918 के अधिनियम ने तिनकठिया समाप्त किया | गरीब किसानों को राहत | पंचाट (arbitration) से मज़दूरी में 35 प्रतिशत वृद्धि |
मुख्य परीक्षा के उत्तर का ढाँचा
प्रश्न: "चंपारण गांधीवादी पद्धतियों की प्रयोगशाला था।" विवेचना कीजिए। (अंक और शब्द सीमा के लिए BPSC का नवीनतम प्रश्नपत्र देखें।)
रूपरेखा:
- भूमिका: अप्रैल 1917, भारत में पहला सत्याग्रह; एक पंक्ति में तिनकठिया।
- परखी गई पद्धतियाँ: सविनय अवज्ञा, तथ्यों की जाँच, बातचीत, रचनात्मक कार्य।
- परिणाम: चंपारण कृषि अधिनियम, 1918।
- व्यापक प्रभाव: खेड़ा, अहमदाबाद, कांग्रेस में किसान, बिहार के नेता।
- निष्कर्ष: प्रयोगशाला से जन आंदोलन तक।
आदर्श उत्तर (संक्षिप्त रूप):
अप्रैल 1917 में जब गांधी चंपारण पहुँचे, तब नील उगाने वाले काश्तकार तिनकठिया से बँधे थे और शरहबेशी तथा तावान के बोझ से दबे थे। उनकी प्रतिक्रिया बाद के आंदोलनों का नमूना बन गई।
पहला, उन्होंने ज़िला छोड़ने के आदेश की खुलकर अवहेलना की और दंड स्वीकार किया, जिससे सरकार को मुकदमा वापस लेना पड़ा।
दूसरा, उन्होंने प्रमाणों पर भरोसा किया: हज़ारों दर्ज बयानों ने बागान मालिकों के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं छोड़ा।
तीसरा, उन्होंने चंपारण कृषि जाँच समिति के सदस्य के रूप में व्यवस्था के भीतर रहकर बातचीत की, और 1918 के अधिनियम ने तिनकठिया समाप्त कर दिया।
चौथा, उन्होंने विरोध के साथ बड़हरवा और भितिहरवा में स्कूल और स्वच्छता का काम जोड़ा।
1918 में खेड़ा और अहमदाबाद में इस पद्धति को निखारा गया और असहयोग आंदोलन में इसे बड़े पैमाने पर अपनाया गया। चंपारण ने बिहार को एक राजनीतिक पीढ़ी भी दी, जिसमें राजेंद्र प्रसाद और अनुग्रह नारायण सिन्हा शामिल थे।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (उत्तर नीचे)
- तिनकठिया प्रथा के तहत नील उगाना पड़ता था: (a) ज़मीन के 1/3 हिस्से पर (b) ज़मीन के 1/4 हिस्से पर (c) ज़मीन के 3/20 हिस्से पर (d) ज़मीन के 3/10 हिस्से पर
- गांधी को चंपारण आने के लिए किसने राज़ी किया? (a) ब्रजकिशोर प्रसाद (b) मज़हरुल हक़ (c) राजेंद्र प्रसाद (d) राजकुमार शुक्ल
- इन कथनों पर विचार कीजिए: (1) चंपारण कहीं भी गांधी का पहला सत्याग्रह था। (2) गांधी चंपारण कृषि जाँच समिति के सदस्य थे। कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) दोनों (d) कोई नहीं
- चंपारण में तावान का अर्थ था: (a) बागान मालिकों द्वारा वसूली गई एकमुश्त रकम (b) बेगार (c) लगान में कटौती (d) गाँव का स्कूल
- कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए: (1) अहमदाबाद मिल हड़ताल (2) चंपारण सत्याग्रह (3) लखनऊ अधिवेशन, जहाँ शुक्ल गांधी से मिले। (a) 2-3-1 (b) 3-1-2 (c) 1-3-2 (d) 3-2-1
उत्तर:
- (c) 20 में से 3 कट्ठे, यानी 3/20।
- (d) राजकुमार शुक्ल।
- (b) कथन 1 गलत है, क्योंकि उनका पहला सत्याग्रह दक्षिण अफ़्रीका में था।
- (a) एकमुश्त रकम।
- (d) लखनऊ अधिवेशन (दिसंबर 1916), चंपारण (1917), अहमदाबाद (1918)।
आगे क्या करें
- चारों शब्द (तिनकठिया, शरहबेशी, तावान, अबवाब) सीखें और हर एक को याद से एक पंक्ति में लिखें।
- चंपारण–खेड़ा–अहमदाबाद वाली तालिका बिना देखे फिर से बनाएँ।
- राष्ट्रीय आंदोलन में बिहार के साथ चंपारण को लंबी कहानी में रखकर देखें, फिर बिहार की किसान राजनीति के अगले चरण के लिए स्वामी सहजानंद सरस्वती और किसान सभा पढ़ें।
- आदर्श उत्तर को समय बाँधकर अपने शब्दों में फिर से लिखें।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Bihar Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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