इस गाइड में
1920 में बाबा रामचंद्र नाम के एक घुमंतू उपदेशक, जो कभी फ़िजी में गिरमिटिया मज़दूर (indentured labourer) रह चुके थे, प्रतापगढ़ के गाँवों में घूम-घूमकर रामचरितमानस का पाठ करते और लगान की बातें करते थे। वे काश्तकारों की एक भीड़ को इलाहाबाद ले आए और जवाहरलाल नेहरू को उनके गाँव देखने के लिए राज़ी किया। नेहरू ने बाद में अपनी आत्मकथा (Autobiography) में लिखा कि इस यात्रा ने उन्हें ऐसा ग्रामीण भारत दिखाया जिसे वे पहले नहीं जानते थे।
UPPSC के लिए यह अध्याय दोहरा काम करता है: प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) और GS I के लिए यह राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास है, और GS V के लिए सीधे-सीधे उत्तर प्रदेश का इतिहास। प्रश्न आमतौर पर कारणों, नेताओं, तरीकों और किसानों के उग्र तेवर के साथ कांग्रेस के असहज संबंध पर केंद्रित रहते हैं।
अवध ही क्यों? कृषि-संबंधी पृष्ठभूमि
1857 के बाद अंग्रेज़ों ने अवध के बड़े भूस्वामियों — ताल्लुकदारों (taluqdars) — को अपने वफ़ादार सहयोगियों के रूप में फिर से खड़ा किया। उनके काश्तकारों को बहुत कम कानूनी सुरक्षा थी। अधिकतर काश्तकार बेमियादी (tenants-at-will) थे, जिन्हें पट्टा खत्म होते ही निकाला जा सकता था।
इससे शिकायतों की एक जानी-पहचानी सूची बनी:
- हर नवीनीकरण पर लगान-वृद्धि (rent enhancement), जो ज़मीन की क्षमता से कहीं अधिक होती थी।
- नज़राना (nazrana): पट्टे के नवीनीकरण के लिए माँगा जाने वाला अनौपचारिक भुगतान।
- बेगार (begar): ज़मींदार के लिए बिना मज़दूरी का जबरन श्रम।
- बेदखली (bedakhli): ज़मीन से निकाल देना, जिससे हर काश्तकार असुरक्षित रहता था।
- शादियों, त्योहारों और उपज पर तरह-तरह के अवैध उपकर (cesses)।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद कीमतें तेज़ी से बढ़ीं, और ज़मींदारों ने लगान और बढ़ा दिया। पहले होमरूल और फिर असहयोग आंदोलन ने इन शिकायतों को संगठित रूप दिया।
एक नज़र में समय-रेखा
| वर्ष | घटना | स्थान / व्यक्ति |
|---|---|---|
| 1918 | उत्तर प्रदेश किसान सभा की स्थापना | इलाहाबाद; गौरी शंकर मिश्र, इंद्र नारायण द्विवेदी, मदन मोहन मालवीय का समर्थन |
| 1920 के मध्य | काश्तकारों का इलाहाबाद तक मार्च; नेहरू ने प्रतापगढ़ के गाँवों का दौरा किया | बाबा रामचंद्र, नेहरू |
| अक्टूबर 1920 | अवध किसान सभा का गठन | प्रतापगढ़; बाबा रामचंद्र, गौरी शंकर मिश्र, माता बदल पांडे, नेहरू |
| जनवरी 1921 | असंतोष फैला; मुंशीगंज में पुलिस की गोलीबारी | रायबरेली, फ़ैज़ाबाद, सुल्तानपुर |
| 1921 | अवध लगान (संशोधन) अधिनियम (Oudh Rent (Amendment) Act) | काश्तकारों को सीमित राहत |
| 1921 का अंत – 1922 की शुरुआत | एका आंदोलन | हरदोई, बहराइच, सीतापुर; मदारी पासी |
| 1931 | कांग्रेस समर्थित लगान-बंदी / राजस्व-बंदी अभियान | उत्तर प्रदेश के कई ज़िले |
| 1936 | अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना | लखनऊ; अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती |
| 1937–39 | कांग्रेस सरकार; उत्तर प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1939 | गोविंद बल्लभ पंत |
| 1950 | उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम | 1952 से लागू |
उत्तर प्रदेश किसान सभा (1918)
गौरी शंकर मिश्र और इंद्र नारायण द्विवेदी ने मदन मोहन मालवीय के समर्थन से 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा (UP Kisan Sabha) की स्थापना की। इसकी शाखाएँ पूरे प्रांत में फैलीं, पर इसका तरीका नरम और संवैधानिक था। 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू होने पर इसके नेता इस सवाल पर बँट गए कि किसान आंदोलन को उसमें शामिल होना चाहिए या नहीं।
अवध किसान सभा (1920)
उग्र धड़े ने अक्टूबर 1920 में प्रतापगढ़ में अलग अवध किसान सभा बनाई, जिसने जल्दी ही पूरे क्षेत्र की ग्राम-स्तरीय सभाओं को अपने में समेट लिया। इसके नेताओं में बाबा रामचंद्र, गौरी शंकर मिश्र, माता बदल पांडे और जवाहरलाल नेहरू शामिल थे।
इसके तरीके अनुशासित और स्थानीय थे:
- बेगार से इनकार;
- बेदखली की ज़मीन — यानी वे खेत जिनसे दूसरे काश्तकारों को निकाला गया था — जोतने से इनकार;
- न झुकने वाले ज़मींदारों का सामाजिक बहिष्कार, नाई-धोबी बंद के ज़रिए: कोई नाई या धोबी उनकी सेवा नहीं करता था।
बाबा रामचंद्र ने प्रतिरोध को रामचरितमानस की धार्मिक शब्दावली में ढाला, और "सीता-राम" एक जोशीला नारा बन गया।
हिंसा की ओर मोड़
जनवरी 1921 में आंदोलन रायबरेली, फ़ैज़ाबाद और सुल्तानपुर तक फैल गया। बाज़ार और ज़मींदारों के घर लूटे गए, और रायबरेली ज़िले के मुंशीगंज में पुलिस ने किसानों पर गोली चलाई। सरकार ने दमन से जवाब दिया, और साथ ही अवध लगान (संशोधन) अधिनियम, 1921 भी पारित किया, जिसने काश्तकारों को कुछ सुरक्षा तो दी, पर उनकी माँगों से बहुत कम।
कांग्रेस अहिंसा के प्रति प्रतिबद्ध थी और ग्रामीण समाज को वर्ग के आधार पर बँटने नहीं देना चाहती थी, इसलिए उसने संयम की अपील की। इस विषय पर मुख्य परीक्षा (Mains) के अधिकांश प्रश्नों का केंद्र यही तनाव है।
एका आंदोलन (1921–22)
दूसरी लहर उत्तरी ज़िलों — हरदोई, बहराइच और सीतापुर — में आई। एका ("एकता") नाम उस शपथ से पड़ा जो किसान धार्मिक सभाओं में लेते थे। शिकायतें ये थीं:
- दर्ज लगान से कहीं अधिक वसूली;
- दमनकारी ठेकेदार (राजस्व वसूलने वाले ठेकेदार, revenue farmers);
- उपज के रूप में चुकाया जाने वाला बटाई-लगान (share-rent)।
शपथ के तहत किसान वचन देते थे कि वे केवल दर्ज लगान देंगे, समय पर देंगे, बेगार और अवैध उपकरों से इनकार करेंगे, और बेदखल किए जाने पर भी अपनी ज़मीन पर डटे रहेंगे।
इसकी शुरुआत में कांग्रेस की भी भूमिका थी, पर जल्दी ही नेतृत्व मदारी पासी के हाथ में चला गया, जो एक हाशिए के समुदाय से आने वाले नेता थे और कांग्रेस के नियंत्रण से बाहर थे। असामान्य बात यह थी कि भारी राजस्व से नाखुश कुछ छोटे ज़मींदार भी इसमें शामिल हुए। आंदोलन और उग्र होता गया, और लगभग मार्च 1922 तक सरकार ने इसे कुचल दिया।
1930 का दशक और ज़मींदारी उन्मूलन की राह
महामंदी (Great Depression) के दौरान फ़सलों के दाम गिर गए, जबकि लगान वही बना रहा। 1931 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने कई ज़िलों में लगान-बंदी / राजस्व-बंदी (no-rent / no-revenue) अभियान का समर्थन किया। इससे उत्तर प्रदेश में सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्वरूप असामान्य रूप से कृषक-प्रधान बन गया। 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई, जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती थे।
गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व वाली 1937 की कांग्रेस सरकार ने उत्तर प्रदेश काश्तकारी अधिनियम, 1939 (UP Tenancy Act) पारित किया, जिससे काश्तकारों की सुरक्षा बेहतर हुई। निर्णायक कदम स्वतंत्रता के बाद उठा: उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950, जो 1952 में लागू हुआ और जिसने बिचौलिया व्यवस्था समाप्त कर दी।
मुख्य परीक्षा के उत्तर का ढाँचा
प्रश्न: "अवध के किसान आंदोलनों (1918–22) ने राष्ट्रीय आंदोलन को मज़बूत भी किया और उस पर दबाव भी डाला।" परीक्षण कीजिए। (लगभग 200 शब्द)
रूपरेखा:
- भूमिका: ताल्लुकदारी व्यवस्था में किसानों की दुर्दशा; एक पंक्ति में कारण।
- चरण: उत्तर प्रदेश किसान सभा (1918), अवध किसान सभा (1920), एका (1921–22)।
- मज़बूती: जन-आधार, नए नेता, नेहरू का उग्र (radical) विचारों की ओर झुकाव।
- दबाव: 1921 की हिंसा, कांग्रेस का संयम, ज़मींदारों के समर्थन पर खतरा।
- निष्कर्ष: काश्तकारी सुधार और 1950 का अधिनियम।
आदर्श उत्तर (संक्षिप्त रूप):
अवध के काश्तकार उन ताल्लुकदारों के अधीन थे, जिन्हें अंग्रेज़ों ने 1857 के बाद फिर से स्थापित किया था। बढ़ते लगान, नज़राना, बेगार और बेदखली के निरंतर डर ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद ग्रामीण क्षेत्र को विद्रोह के लिए तैयार कर दिया।
उत्तर प्रदेश किसान सभा (1918) ने किसानों को एक मंच दिया। अधिक उग्र अवध किसान सभा (प्रतापगढ़, अक्टूबर 1920) ने, जिसका नेतृत्व बाबा रामचंद्र कर रहे थे और जिसे जवाहरलाल नेहरू का समर्थन था, सामाजिक बहिष्कार और बेगार से इनकार का रास्ता अपनाया। मदारी पासी के नेतृत्व में एका आंदोलन इस संघर्ष को हरदोई, बहराइच और सीतापुर तक ले गया।
इन आंदोलनों ने असहयोग को गाँव की शिकायतों से जोड़कर और नीचे से नेता पैदा करके राष्ट्रवाद को मज़बूत किया। साथ ही इन्होंने उस पर दबाव भी डाला: जनवरी 1921 की हिंसा और एका की उग्रता ने कांग्रेस को संयम की अपील करने पर मजबूर किया, ताकि अहिंसा और ज़मींदारों का समर्थन, दोनों बचे रहें।
अवध लगान (संशोधन) अधिनियम, 1921 ने सीमित राहत दी, और "जोतने वाले को ज़मीन" की माँग अंततः उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम, 1950 में साकार हुई।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (उत्तर नीचे)
- 1920 में अवध किसान सभा की स्थापना कहाँ हुई थी? (a) इलाहाबाद (b) हरदोई (c) लखनऊ (d) प्रतापगढ़
- एका आंदोलन का नेतृत्व किसने किया? (a) मदारी पासी (b) गौरी शंकर मिश्र (c) बाबा रामचंद्र (d) माता बदल पांडे
- बेदखली का अर्थ है: (a) जबरन श्रम (b) काश्तकारों को ज़मीन से निकालना (c) पट्टा-नवीनीकरण शुल्क (d) बटाई-लगान
- इन कथनों पर विचार कीजिए: (1) उत्तर प्रदेश किसान सभा की स्थापना 1918 में मदन मोहन मालवीय के समर्थन से हुई थी। (2) अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना 1936 में लखनऊ में हुई थी। कौन-सा सही है? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) दोनों (d) कोई नहीं
- जनवरी 1921 की मुंशीगंज गोलीबारी किस ज़िले में हुई? (a) सुल्तानपुर (b) फ़ैज़ाबाद (c) सीतापुर (d) रायबरेली
उत्तर:
- (d) प्रतापगढ़। इलाहाबाद वह जगह है जहाँ 1918 में उत्तर प्रदेश किसान सभा शुरू हुई थी।
- (a) मदारी पासी, हरदोई, बहराइच और सीतापुर में।
- (b) बेदखली। जबरन श्रम बेगार है; नवीनीकरण शुल्क नज़राना है।
- (c) दोनों कथन सही हैं।
- (d) रायबरेली।
आगे क्या करें
- 1918–1950 की समय-रेखा बिना देखे बनाएँ।
- ऊपर दिया गया आदर्श उत्तर शब्द-सीमा के भीतर अपने शब्दों में लिखें।
- राष्ट्रीय आंदोलन में उत्तर प्रदेश में पढ़ें कि ये आंदोलन बड़ी कहानी में कहाँ बैठते हैं, फिर उत्तर प्रदेश में भारत छोड़ो आंदोलन की ओर बढ़ें।
- बाबा रामचंद्र और मदारी पासी को अपनी उत्तर प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी सूची में जोड़ें।
तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Uttar Pradesh Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।
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