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स्वामी सहजानंद सरस्वती और किसान सभा

गाजीपुर का एक संन्यासी स्वतंत्रता-पूर्व भारत का सबसे प्रभावशाली किसान नेता बना। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार प्रांतीय किसान सभा (1929) कैसे बनाई, अखिल भारतीय किसान सभा (1936) और बकाश्त संघर्षों का नेतृत्व कैसे किया, कांग्रेस से उनका टकराव क्यों हुआ और ज़मींदारी उन्मूलन राष्ट्रीय एजेंडे पर कैसे आया। समयरेखा, आदर्श उत्तर और MCQ।

8 Oct 2026 8 मिनट में पढ़ें

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इस गाइड में
  1. समस्या: बिहार में ज़मींदारी
  2. स्वामी सहजानंद सरस्वती कौन थे?
  3. एक नज़र में समयरेखा
  4. सोनपुर से लखनऊ तक
  5. बकाश्त संघर्ष, 1937–39
  6. कांग्रेस से मतभेद
  7. विरासत
  8. मुख्य परीक्षा के उत्तर का ढाँचा
  9. प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (उत्तर नीचे)
  10. आगे क्या करें

1917 का चंपारण विदेशी बागान मालिकों के ख़िलाफ़ लड़ाई था। बिहार का अगला बड़ा किसान संघर्ष कठिन था, क्योंकि इस बार विरोधी भारतीय था: ज़मींदार (zamindar), जो अक्सर कांग्रेस का समर्थक होता था और कभी-कभी कांग्रेस का नेता भी। उसके ख़िलाफ़ काश्तकारों को संगठित करने वाले व्यक्ति गेरुआधारी संन्यासी स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, और उनकी किसान सभा (Kisan Sabha) ने बदल दिया कि राष्ट्रीय आंदोलन "आज़ादी" से क्या समझता है।

BPSC के लिए इस विषय से प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में आसान अंक मिलते हैं (वर्ष, स्थान, बकाश्त जैसे शब्द), और मुख्य परीक्षा (Mains) के GS प्रश्नपत्र I के लिए एक मज़बूत विषय: राष्ट्रवाद और कृषि प्रश्न।

समस्या: बिहार में ज़मींदारी

1793 के स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) के तहत ज़मींदार सरकार को एक तय राजस्व देता था और काश्तकार, यानी रैयत (raiyat), से मनमानी वसूली के लिए स्वतंत्र था। 1920 के दशक तक आम बोझ ये थे:

  • ऊँचा और बढ़ता लगान (लगान / मालगुज़ारी, rent);
  • अवैध उपकर (अबवाब, abwab) — शादी-ब्याह, त्योहारों और ज़मींदार के अपने ख़र्चों पर;
  • बेगार (बेगारी, begari, forced labour);
  • बकाया लगान पर बेदख़ली (bedakhli, eviction);
  • बकाश्त (bakasht): वह ज़मीन जिसे ज़मींदार अपनी "ख़ुद की खेती" घोषित कर देता था; अक्सर यह बेदख़ली के बाद काश्तकारों से छीनी जाती थी और फिर उन्हीं से बदतर शर्तों पर जुतवाई जाती थी।

बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 (Bengal Tenancy Act), जो बिहार पर भी लागू था, दख़लकारी अधिकार (occupancy rights) केवल काग़ज़ पर देता था। फिर 1929 से महामंदी (Great Depression) में फ़सलों के दाम गिर गए, जबकि नकद लगान उतना ही बना रहा। अगर दाम आधे हो जाएँ, तो उतना ही लगान चुकाने के लिए काश्तकार को दोगुना अनाज बेचना पड़ता है। किसी भी उत्तर में यही आर्थिक कारण लिखें।

स्वामी सहजानंद सरस्वती कौन थे?

उनका जन्म 1889 में वर्तमान उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ज़िले में नौरंग राय के रूप में हुआ, और युवावस्था में उन्होंने संन्यास लिया। उनका आरंभिक सार्वजनिक काम उनकी अपनी जाति-सभा के भीतर समाज सुधार था। असहयोग आंदोलन (1920–22) के दौरान वे कांग्रेस में शामिल हुए और जेल गए।

1927 में उन्होंने पटना के पास बिहटा में सीताराम आश्रम स्थापित किया, जो उनका केंद्र बना, और पश्चिमी पटना क्षेत्र में काश्तकारों को संगठित करना शुरू किया। उनका निधन 1950 में हुआ। उनकी आत्मकथा का नाम मेरा जीवन संघर्ष है।

एक नज़र में समयरेखा

वर्षघटना
1927बिहटा में सीताराम आश्रम; पश्चिमी पटना में काश्तकारों का संगठन
1929सोनपुर में बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन
1934कांग्रेस समाजवादी पार्टी का गठन; किसान सभा के कई कार्यकर्ता उसमें शामिल हुए
1936लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा; सहजानंद पहले अध्यक्ष, एन. जी. रंगा महासचिव; किसान घोषणापत्र
1937बिहार में कांग्रेस मंत्रिमंडल; इसके बाद काश्तकारी संशोधन क़ानून
1937–39बकाश्त संघर्ष: बड़हिया टाल, रेवड़ा, अमवारी और अन्य
1940रामगढ़ में सुभाष चंद्र बोस के साथ समझौता-विरोधी सम्मेलन
1950सहजानंद का निधन; बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950

सोनपुर से लखनऊ तक

बिहार प्रांतीय किसान सभा (Bihar Provincial Kisan Sabha) का गठन 1929 में सोनपुर में हुआ, और सहजानंद इसके प्रमुख व्यक्ति थे। शुरू में यह कांग्रेस के दायरे में ही काम करती थी और ज़मींदारी ख़त्म करने की नहीं, काश्तकारी सुधार की माँग करती थी।

महामंदी ने यह बदल दिया। 1930 के दशक के मध्य तक माँग ज़मींदारी उन्मूलन (abolition of zamindari) की हो गई थी। आंदोलन से अक्सर जोड़ा जाने वाला नारा, "जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो क़ानून बनाएगा", कहता है कि जो अन्न और कपड़ा पैदा करते हैं, अब वही क़ानून बनाएँगे।

अप्रैल 1936 में लखनऊ में, जहाँ कांग्रेस का अधिवेशन भी हो रहा था, कई प्रांतों के किसान नेताओं ने अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha, AIKS) बनाई। सहजानंद इसके पहले अध्यक्ष थे और एन. जी. रंगा महासचिव। इसके किसान घोषणापत्र (Kisan Manifesto, 1936) की माँगों में ये भी थीं:

  • ज़मींदारी का उन्मूलन;
  • लगान और राजस्व में भारी कटौती;
  • ग्रामीण क़र्ज़ में कमी;
  • बेगारी और अवैध उपकरों का अंत, और किसान संघों को मान्यता।

कांग्रेस के फ़ैज़पुर अधिवेशन (दिसंबर 1936) ने, जो किसी गाँव में हुआ उसका पहला अधिवेशन था, एक कृषि कार्यक्रम अपनाया जिसमें इस दबाव की कुछ झलक थी, हालाँकि वह उन्मूलन तक नहीं गया।

बकाश्त संघर्ष, 1937–39

1937 में बिहार में सत्ता में आए कांग्रेस मंत्रिमंडल ने काश्तकारी संशोधन पारित किए, जिनसे कुछ लगान घटे और बकाश्त ज़मीन की आंशिक वापसी की अनुमति मिली। किसान सभा की राय में यह राहत कम थी और ज़मींदारों से समझौता कुछ ज़्यादा ही सहज था।

इसलिए काश्तकारों ने सीधी कार्रवाई की। विवादित ज़मीन पर उन्होंने ज़मींदार की अवज्ञा करते हुए हल चलाया, बुवाई की और फ़सल काटी, और सत्याग्रह की शैली में गिरफ़्तारी दी। सबसे प्रसिद्ध केंद्र:

स्थान (तब का ज़िला)आम तौर पर बताए जाने वाले नेताटिप्पणी
बड़हिया टाल (मुंगेर)कार्यानंद शर्मानिचली टाल भूमि; लंबा संघर्ष
रेवड़ा (गया)जदुनंदन शर्मागया किसान सभा का गढ़ था
अमवारी (सारण)राहुल सांकृत्यायनविद्वान-यात्री पर हमला हुआ और उन्हें जेल हुई

कई जगह उन्होंने ज़मीन वापस पाई और दिखाया कि काश्तकार कांग्रेस नेताओं का इंतज़ार किए बिना संगठित हो सकते हैं।

कांग्रेस से मतभेद

कांग्रेस को किसानों की संख्या के साथ-साथ ज़मींदारों का पैसा और प्रभाव भी चाहिए था, और वह वर्ग-संघर्ष को आज़ादी तक टालना चाहती थी। सहजानंद का तर्क था कि जो आज़ादी ज़मींदारी को बना रहने दे, वह रैयत के लिए आज़ादी नहीं है। 1937 के बाद वे वामपंथ की ओर और सुभाष चंद्र बोस की ओर झुके, जिनके साथ उन्होंने 1940 में रामगढ़ में समझौता-विरोधी सम्मेलन (Anti-Compromise Conference) किया। 1940 के दशक में अखिल भारतीय किसान सभा और कम्युनिस्टों से उनके संबंधों के विवरण अलग-अलग मिलते हैं, इसलिए परीक्षा में इसी मोटे बदलाव तक सीमित रहें।

मुद्दाकांग्रेस (मोटे तौर पर)किसान सभा
ज़मींदारीकाश्तकारी में सुधार; उन्मूलन बाद मेंइसे ख़त्म करो
मुख्य शत्रुब्रिटिश शासनब्रिटिश शासन और ज़मींदारी, दोनों
तरीकाबातचीत, क़ानूनजन-कार्रवाई, बकाश्त सत्याग्रह
वर्ग-संघर्षटालो; संयुक्त मोर्चा बनाए रखोअपरिहार्य

विरासत

किसान सभा आज़ादी से पहले ज़मींदारी का उन्मूलन नहीं करवा सकी, पर उसने उन्मूलन को अटल बना दिया। बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 (Bihar Land Reforms Act) भारत के पहले ज़मींदारी उन्मूलन क़ानूनों में से एक था। जब पटना उच्च न्यायालय ने कामेश्वर सिंह मामले में इसे रद्द कर दिया, तो संसद ने पहला संविधान संशोधन, 1951 पारित किया, जिसने अनुच्छेद 31A और 31B तथा नौवीं अनुसूची (Ninth Schedule) जोड़ी। व्यवहार में उन्मूलन कैसे हुआ, यह जानने के लिए बिहार में भूमि सुधार पढ़ें।

इसकी सीमाएँ भी मायने रखती हैं। सभा मुख्य रूप से दख़लकार काश्तकारों (occupancy tenants) की आवाज़ थी। भूमिहीन मज़दूरों को कम लाभ मिला, और वापस मिली ज़मीन अक्सर सबसे गरीबों के बजाय मझोले किसानों के पास गई।

मुख्य परीक्षा के उत्तर का ढाँचा

प्रश्न: "किसान सभा ने कृषि प्रश्न को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया।" बिहार के संदर्भ में विवेचना कीजिए। (अंकों और शब्द-सीमा के लिए BPSC का नवीनतम प्रश्नपत्र देखें।)

रूपरेखा:

  1. भूमिका: स्थायी बंदोबस्त, ज़मींदारी के बोझ, महामंदी।
  2. संगठन: सोनपुर 1929, अखिल भारतीय किसान सभा 1936, किसान घोषणापत्र।
  3. कार्रवाई: बकाश्त संघर्ष, 1937–39।
  4. कांग्रेस पर प्रभाव: फ़ैज़पुर, 1937 के काश्तकारी क़ानून, मतभेद।
  5. विरासत और सीमाएँ: 1950 का अधिनियम, पहला संशोधन, भूमिहीन पीछे छूटे।

आदर्श उत्तर (संक्षिप्त रूप):

स्थायी बंदोबस्त के तहत बिहार के रैयत बढ़ते लगान, अबवाब, बेगारी और बकाश्त के रूप में ज़मीन छिनने का सामना कर रहे थे, और महामंदी ने इन्हें असहनीय बना दिया।

स्वामी सहजानंद सरस्वती ने इस आक्रोश को संगठित रूप दिया: 1929 में सोनपुर में बिहार प्रांतीय किसान सभा, और 1936 में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा, जिसके पहले अध्यक्ष वे स्वयं थे और जिसकी माँग ज़मींदारी उन्मूलन थी।

इस दबाव का असर फ़ैज़पुर में और 1937 के काश्तकारी क़ानूनों में दिखा। जब राहत कम पड़ी, तो काश्तकारों ने बड़हिया, रेवड़ा और अमवारी में बकाश्त ज़मीन वापस ली।

अब ज़मीन का मुद्दा हाशिये पर नहीं रह सकता था, और 1950 में बिहार भूमि सुधार अधिनियम आया। भूमिहीनों के लिए इसकी सीमाएँ दिखाती हैं कि सभा मुख्य रूप से काश्तकारों का आंदोलन थी।

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (उत्तर नीचे)

  1. बिहार प्रांतीय किसान सभा का गठन 1929 में कहाँ हुआ था? (a) पटना (b) सोनपुर (c) बिहटा (d) गया
  2. अखिल भारतीय किसान सभा (1936) के पहले अध्यक्ष कौन थे? (a) एन. जी. रंगा (b) जयप्रकाश नारायण (c) स्वामी सहजानंद सरस्वती (d) कार्यानंद शर्मा
  3. बकाश्त ज़मीन का अर्थ था: (a) मंदिरों को दी गई ज़मीन (b) वह ज़मीन जिस पर ज़मींदार अपनी ख़ुद की खेती का दावा करता था, और जो अक्सर काश्तकारों से छीनी जाती थी (c) नील की खेती वाली ज़मीन (d) वन भूमि
  4. विचार कीजिए: (1) राहुल सांकृत्यायन ने अमवारी संघर्ष में भाग लिया। (2) बड़हिया टाल का संबंध कार्यानंद शर्मा से है। कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) दोनों (d) कोई नहीं
  5. सही क्रम में लगाइए: (1) अखिल भारतीय किसान सभा (2) चंपारण कृषि अधिनियम (3) बिहार भूमि सुधार अधिनियम (4) बिहार प्रांतीय किसान सभा। (a) 2-4-1-3 (b) 4-2-1-3 (c) 2-1-4-3 (d) 4-1-2-3

उत्तर:

  1. (b) सोनपुर। बिहटा उनका आश्रम था।
  2. (c) सहजानंद। रंगा महासचिव थे।
  3. (b) विकल्प (c) चंपारण की तिनकठिया प्रथा का वर्णन है।
  4. (c) दोनों कथन सही हैं।
  5. (a) 1918, 1929, 1936, 1950।

आगे क्या करें

  • पाँचों बोझ (लगान, अबवाब, बेगारी, बेदख़ली, बकाश्त) एक-एक पंक्ति में, हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में लिखें।
  • इस आंदोलन की तुलना चंपारण सत्याग्रह से दो कॉलम में करें।
  • दोनों को राष्ट्रीय आंदोलन में बिहार के संदर्भ में रखें।
  • आदर्श उत्तर को 15 मिनट में अपने शब्दों में लिखें।

तारीख़ों और आँकड़ों पर एक बात। परीक्षा का पैटर्न, रिक्तियाँ और कार्यक्रम हर साल बदल सकते हैं। ताज़ा जानकारी हमेशा Bihar Public Service Commission की वेबसाइट पर जारी नवीनतम अधिसूचना में देखें।

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